उत्तराखण्ड में ब्रिटिश शासन का इतिहास (History of British rule in Uttarakhand)
उत्तराखण्ड में पन्द्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में छोटी-छोटी सामंतशाहियों का एकीकरण कर चंद, परमार शक्तियों
ने
अपना
प्रभुत्व
स्थापित
किया
और
कुमाऊँ
तथा
गढ़वाल
के
दो
पृथक
राज्यों
की
स्थापना
की।
राज्यों
के
बीच
निरन्तर
होने
वाले
युद्धों,
बाह्य
आक्रमणों
आदि
के
कारण
कला
और
संस्कृति
के
क्षेत्र
में
उल्लेखनीय
प्रगति
नहीं
हो
पाई
किन्तु
अन्य
कई
क्षेत्रों
में
युगान्तकारी
परिवर्तन
हुए।
इस
काल
में
स्थायी
शान्ति
व्यवस्था
न
होने
के
बावजूद
भी गोरखा युगीन
अराजकता
के
दर्शन
नहीं
होते।
1815 के
उपरान्त
उत्तराखण्ड
में
औपनिवेशिक
शासन
के
प्रवेश
के
साथ
ही
इस
अंचल
के
राजनैतिक,
सामाजिक,
आर्थिक
तथा
सांस्कृतिक
स्वरूप
में
बदलाव
आया।
उत्तराखण्ड में ब्रिटिश आगमन के उद्देश्य एवं पृष्ठभूमि
उत्तराखण्ड में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के आगमन को उसके औपनिवेशिक और अन्वेषी नजरिये के आधार पर व्यापक परिदृश्य में देखने के प्रयास किए गए हैं। विभिन्न यूरोपीय यात्रियों जैसे देसीदेरी, मूरक्राफ्ट,
कैप्टन
हियरसे,
फेजर आदि
के
विवरणों
तथा
अन्य
उपलब्ध
साक्ष्यों
के
आधार शेखर
पाठक ने
18वीं
– 19वीं
शताब्दी
को
हिमालय
के
संदर्भ
में
युगान्तरकारी
बताते
हुए
कम्पनी
के
हिमालय
आकर्षण
तथा
उत्तराखण्ड
में
घुसपैठ
के
प्रमुख
उद्देश्यों
को
इस
प्रकार
चिह्नित
किया
है
–
1. ईसाई धर्म का प्रसार
2. कम्पनी तथा इंग्लैंड की औद्योगिक जरूरतों हेतु कच्ची सामग्री तथा बाजार ढूढना
3. नेपाल युद्ध के बाद सैन्य जातियों की खोज
4. हिमालय में छोटा इंग्लैंड बनाने का स्वप्न
5. नेपोलियन के कारण संभावित खतरे का क्षेत्र पश्चिमी हिमालय और काराकोरम होना
6. गोरखों के प्रति कुमाऊँ गढ़वाल तथा हिमाचल में मौजूद असन्तोष और गोरखों द्वारा बार बार कम्पनी क्षेत्र में घुसपैठ
7. उत्तराखण्ड की वन संपदा जिसमें कम्पनी को पर्याप्त लाभ प्राप्त होने की संभावना थी।
उत्तराखंड का प्रशासनिक पुनर्गठन – (ब्रिटिश कुमाऊँ, गढ़वाल)
1815 में गोरखों को
पराजित
करने
के
उपरान्त
कम्पनी
ने
सिगौली
की
संधि
से
कुमाऊँ
तथा
गढ़वाल
को
ईस्ट
इण्डिया
कम्पनी
द्वारा
शासित
क्षेत्र
के
अन्तर्गत
ले
लिया
गया
ओर
एक
पृथक
प्रशासनिक
इकाई
के
रूप
में
कुमाऊँ
कमिश्नरी
का
गठन
हुआ। वर्तमान देहरादून
जिले
का
भू-भाग
मेरठ
कमिश्नरी
के
अन्तर्गत सहारनपुर
जिले
से
संयुक्त
किया
गया। मन्दाकिनी और
अलकनन्दा
का
पश्चिमी
भाग
(वर्तमान
उत्तरकाशी
और
टिहरी जिले)
राजा
सुदर्शनशाह
को
दिया
गया।
राजा
ने
भागीरथी
और
भिलंगना
नदियों
के
बायें
तट
पर
स्थित
टिहरी
नामक
एक
छोटे
से
गाँव
को
अपनी
राजधानी
बनाया। 1824
में रवाई
परगने
का
कुछ
भाग
भी
टिहरी
में
शामिल
किया
गया। 1825
में देहरादून
तथा
जौनसार
को
सहारनपुर
से
लेकर
कुमाऊँ कमिश्नरी
में
सम्मिलित
कर
लिया
गया, पर
1829 में
पुनः
कुमाऊँ
से
पृथक
कर
दिया
गया।
इस
प्रकार
1815 में
देहरादून
के
मेरठ
कमिश्नरी
से
संयुक्त
किए
जाने
के
उपरान्त
उत्तराखण्ड
दो
भिन्न
सामाजिक-राजनीतिक
इकाइयों
में
विभक्त
दिखाई
देता
है-
ब्रिटिश
कुमाऊँ
और
टिहरी
रियासत
।
इनमें
से
ब्रिटिश
कुमाऊँ
के
अन्तर्गत
कुमाऊँ
तथा
गढ़वाल
दोनों
सम्मिलित
थे।
काफी
समय
तक
कुमाऊँ
गैर
आइनी
प्रदेश
(Non Regulation Province) रहा।
ब्रिटिश कुमाऊँ (गढ़वाल)
उत्तर
में
तिब्बत
से
लेकर
दक्षिण
में
रुहेलखण्ड तक
तथा पश्चिम में
टिहरी
राज्य
से
पूर्व
में
नेपाल तक
विस्तृत
लगभग
9600 वर्ग
किमी.
का
भू-भाग
इसके
अन्तर्गत
था।
इस
क्षेत्र
पर
औपनिवेशिक
शासन
के
तेरह
दशकों
(1815-1947) में
से जॉर्ज विलियम
ट्रेल
(1815-35), जे.एच.
बैटन
(1848-1856), तथा हेनरी
रैमजे
(1856-1884) का युग व्यापक निर्माण एवं परिवर्तनों का युग रहा। इस अवधि में विभिन्न बन्दोबस्तों के माध्यम से कुमाऊँ की प्रशासनिक इकाइयों और उनकी सीमाओं के पुनर्गठन के साथ-साथ भू-व्यवस्था को भी एक नया स्वरूप प्रदान किया गया। अगले छः दशकों में 17 कमिश्नर और हुए।
1815 में
एडवर्ड
गार्डनर
को
कुमाऊँ
का
प्रथम
कमिश्नर
नियुक्त
किया
गया, किन्तु
छः
माह
बाद
ही
ट्रेल
को
कमिश्नर
बनाया
गया।
ब्रिटिश
कुमाऊँ
के
प्रशासनिक
पदानुक्रम
में
कमिश्नर
सर्वोच्च
पदाधिकारी
था।
1839 में
कुमाऊँ
कमिश्नरी
को
दो
जिलों-
कुमाऊँ
तथा
गढ़वाल
में
विभाजित
किया
गया। 1858 के
भारत
सरकार
अधिनियम द्वारा
भारतीय
प्रशासन
का
नियंत्रण
ईस्ट
इण्डिया
कम्पनी
से
ब्रिटिश
क्राउन
को
सौंपे
जाने
के
बाद
प्रशासनिक
दृष्टि
से
पहला
परिवर्तन 1862 में तराई
जिले
के
गठन
के
रूप
में
हुआ । 1871 में देहरादून
को
सहारनपुर
जिले
से
अलग
करके
एक
स्वतंत्र
जिला
घोषित
किया
गया।
1891 में
कुमाऊँ
के
छः
तथा
तराई
के
सात
परगनों
को
मिलाकर
नैनीताल
जिले
का
और
कुमाऊँ
जिले
के
शेष
भाग
से
अल्मोड़ा
जिले
का
गठन
किया
गया।
1815 में
प्रथम
कमिश्नर
एडवर्ड
गार्डनर
के
समय
यहाँ
नौ
तहसीलें
– अल्मोड़ा,
काली
कुमाऊँ,
पाली
पछाऊँ,
कोटा,
सोर,
फलदाकोट,
रामगढ़,
श्रीनगर
और
चाँदपुर
थीं 1816 में
द्वितीय
कमिश्नर
ट्रेल
ने
इन
तहसीलों
को
अल्मोड़ा
में
मिलाकर
इस
नयी
तहसील
को
हजूर
तहसील
नाम
दिया। 1821 में सोर
तहसील
को
समाप्त
करके
गंगोली
को
हजूर
तहसील
(अल्मोड़ा)
में
तथा
सोर-सीरा
और
अस्कोट
परगनों
को
काली
कुमाऊँ
से
संयुक्त
किया
गया। 1823 ई.
में
साल
अस्सी
(संवत
1880) के
बन्दोबस्त
के
माध्यम
से
ट्रेल
ने
प्रशासनिक
व्यवस्था
में
व्यापक
परिवर्तन
किए।
इस
समय
तक
तहसीलों
की
संख्या
घटकर
चार
(हजूर,
काली
कुमाऊँ,
श्रीनगर
और
चाँदपुर)
रह
गई। 1834 में ट्रेल
ने
श्रीनगर
और
चाँदपुर
को
एक
तहसील
में
संयुक्त
करके
कैन्यूर
को
नई
तहसील
का
मुख्यालय
बनाया।
1839 में
पृथक
जिला
बनने
के
बाद
गढ़वाल
में
एक
ही
तहसील
थी,
जिसका
मुख्यालय
पौड़ी
में
था। 1840 के
बाद
कुमाऊँ
जिले
में
एक
तीसरी
तहसील
भाबर
का
गठन
हुआ,
जो
संभवतः
19वीं
शताब्दी
के
पाँचवें
दशक
तक
बनी
रही।
कुछ
समय
के
लिए
इस
तहसील
को
विघटित
कर
दिया
गया
और
1860 के
बाद
किसी
वर्ष
में
पुनः
भाबर
तहसील
का
गठन
करके
हल्द्वानी
में
इसका
मुख्यालय
बनाया
गया।
1891 में
नैनीताल
तहसील
बनी।
1891 में
तराई
क्षेत्र
में
भी
तीन
तहसीलें
– काशीपुर,
रुद्रपुर
तथा
किलपुरी
थीं।
प्रारंभ में ब्रिटिश कुमाऊँ के पूर्वी क्षेत्र (कुमाऊँ) में कुल चौदह तथा पश्चिमी क्षेत्र (गढ़वाल) में कुल सत्रह परगने थे। 1821 में इनकी संख्या बढ़ाकर उन्नीस कर दी गई। गढ़वाल में कुछ परगनों को विघटित करके अन्य परगनों में सम्मिलित किया गया और सत्रह के स्थान पर कुल ग्यारह परगनों का सृजन हुआ। 1838-46 में
बैटन
के
बन्दोबस्त
में
भी
इनकी
संख्या
और
स्थिति
यथावत
रही।
ट्रेल के समय में कुमाऊँ के परगनों में कुल अस्सी (80) तथा गढ़वाल में कुल अड़तालीस (48) पट्टियाँ थीं। परंतु पट्टियों का निर्धारण भौगोलिक सीमाओं को ध्यान में रखकर नहीं किया गया था। हेनरी
रैमजे
के
काल
में
बैकेट
ने
1861-64 (गढ़वाल)
तथा
1863, 73 (कुमाऊँ) में
अपने
तीस
वर्षीय
बन्दोबस्त
(दसवें)
के
द्वारा
इस
क्षेत्र
के
परगनों
में
स्थित
पट्टियों
तथा
उनके
गाँवों
की
सीमाओं
का
पुनर्निर्धारण
और
विभाजन
इनकी
भौगोलिक
विशेषताओं
को
ध्यान
में
रखते
हुए
किया।
1892-93 में
पुनः
पट्टियों
की
सीमाओं
में
कुछ
परिवर्तन
किए
गए।
इस
परिवर्तन
के
बाद
अल्मोड़ा
जिले
में
101, नैनीताल
में
25 तथा
गढ़वाल
जिले
में
77 पट्टियाँ
विद्यमान
थीं।
बैकेट
के
बन्दोबस्त
की
अवधि
1902 ई.
तक
ही
होने
के
कारण
1899 में
गूज
ने पुनरीक्षण
कार्य
किया
परन्तु
कुछ
परगनों
में
कृषि
भूमि
की
माप
और
कर
संबंधी
सुधारों
को
छोड़कर
बेकेट
द्वारा
किए
गए
कार्यों
में
किसी
भी
प्रकार
के
परिवर्तन
का
प्रयास
नहीं
किया।
1857 और उत्तराखण्ड
1857 की
घटनाओं
ने
उत्तराखण्ड
को
भी
प्रभावित
किया,
पर
यह
प्रत्यक्ष रूप
से
इससे
प्रभावित
नहीं
हुआ।
यहाँ
विरोधियों
में कालू महरा,
आनंदसिंह
फत्र्याल,
बिशन
सिंह
करायत के
नाम
उल्लेखनीय
हैं।
कमिश्नर
रैमजे
ने
पर्वतीय
भागों
को
इसके
प्रभाव
से
रोकने
के
लिए
पर्याप्त
उपाय
किए।
ब्रिटिश
गढ़वाल
में
पुराने
वन
ठेकेदार
पदमसिंह
नेगी
तथा
कमाऊँ
के
प्रवेश
मार्गों
पर
धर्मानन्द
जोशी
को
प्रभार
सौंपा
गया।
प्रशासनिक
सक्रियता
से
यहाँ
स्थिति
नियंत्रण
में
रही।
तराई-भाबर
का
इलाका
इससे
पूरी
तरह
प्रभावित
हुआ।
कुमाऊँ परिषद
1916 में
गोविन्दबल्लभ
पंत,
हरगोविन्द
पंत,
चंद्रलाल
शाह,
बदरीदत्त
पांडे आदि
के
प्रयासों
से कुमाऊँ परिषद
की
स्थापना हुई,
जिसका प्रथम अधिवेशन
नैनीताल के
मझेड़ा
ग्राम
में रायबहादुर नारायणदत्त
छिपाल
की
अध्यक्षता में
हुआ।
1916 से
1926 तक
इसके
सात
अधिवेशन
हुए। 1923 से परिषद
ने
कांग्रेस
के
कार्यक्रमों
को
अपना
लिया
ब्रिटिश काल में उत्तराखण्ड का प्रशासनिक विकास
उत्तराखण्ड राज्य
को गोरखों से
हस्तगत
करने
के
पश्चात् अंग्रेजों ने
अपनी
पूर्व
नियोजित
योजना
के
तहत
इस
विजित
क्षेत्र
का
विभाजन
दो
भागों
में
कर
दिया।
§ अलकनन्दा नदी
से पश्चिम के भाग पर गढ़ नरेश के वंशज सुदर्शनशाह को पुनः स्थापित किया जिसे ‘टिहरी रियासत’ के नाम से जाना जाता है।
§ जबकि अलकनन्दा के पूर्व का गढ़वाल क्षेत्र एवं सम्पूर्ण कुमाऊँ क्षेत्र को सीधे ब्रिटिश नियंत्रण में लाया गया।
1839 में
विभाजित
होने
से
पूर्व
इस
सम्पूर्ण
क्षेत्र
को
ब्रिटिश
कुमाऊँ
गढ़वाल
के
नाम
से
जाना
जाता
था।
उत्तराखण्ड
राज्य
की
वर्तमान
प्रशासनिक
व्यवस्थाएँ
कहीं
न
कहीं
इस
काल
में
हुए
प्रशासनिक
प्रयोगों
एवं
परिवर्तनों
का
ही
प्रतिफल
है।
सामान्यतः
इस
राज्य
का
प्रशासनिक
विकास
दो
चरणों
में
हुआ।
प्रथमतः
गैर
विनियमित
क्षेत्र
के
रूप
में
एवं
1816 ई.
के
उपरान्त
विनियमित
क्षेत्र
के
रूप
में
इसके
प्रशासनिक
ढाँचे
का
संगठन
किया
गया।
1815 से
1861 ई0
के
मध्य
इस
क्षेत्र
को
क्रमशः
कुमाऊँ
कमिश्नर
तथा
उत्तर पश्चिमी
प्रान्त
के
लै0
गर्वनर
के
आदेशों
से
प्रशासित
किया
गया।
वर्तमान उत्तराखण्ड की प्रशासनिक व्यवस्थाएँ इस युग की ही देन है। पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण गैर विनियमित क्षेत्र के रूप में प्रयोग का यहाँ स्थायी प्रभाव पड़ा। उत्तराखण्ड राज्य की राजस्व पुलिस व्यवस्था इस युग की विशिष्ट देन है। वर्तमान में भी उत्तराखण्ड भारत वर्ष का एकमात्र राज्य जो पटवारी व्यवस्था द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों को संचालित करता है। मुख्यतः इस प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे का विकास प्रारम्भिक कमिश्नरों के निजी प्रयासों का प्रतिफल अधिक लगता है।
इस
कारण
हमने
उत्तराखण्ड
के
प्रशासनिक
विकास
का
वर्णन
निम्नॉकित
तीन
शीर्षकों
के
अधीन
किया
है
–
उत्तराखंड में ई. गार्डनर एवं ट्रेल के सुधार
ई0 गार्डनर
(E. Gardner) को 1815 ई0
में
कुमाऊँ
का
पहला
कमिश्नर
नियुक्त
किया
गया। उनके
सहायक
के
रूप
में
ट्रेल
को
नियुक्ति
मिली।
इसके
साथ
ही
उत्तराखण्ड
के
प्रशासनिक
नवाचार
के
एक
नए
युग
का
शुभारम्भ
हुआ।
अपने
नौ
महीनों
के
कार्यकाल
में
गार्डनर
ने
तहसीलों,
थानों,
सदर
कार्यालय,
भूराजस्व,नानकर
भूमियों
की
जाँच
इत्यादि
का
कार्य
प्रारम्भ
किया।
सात
तहसीलों
और
पाँच
थानों
की
स्थापना
की।
सहायक
ट्रेल
को
बंदोबस्त
के
कार्य
में
लगाया।
यद्यपि
इस
बीच
आंग्ल-नेपाल
संघर्ष
जारी
था
एवं
गार्डनर
राजनीतिज्ञ
एजेण्ट
की
भूमिका
भी
इसमें
निभा
रहे
थे।
इस
कारण
उन्हें
प्रशासन
में
सुधार
का
अधिक
समय
न
मिल
पाया।
गार्डनर को सिंगोंली की संधि की
पुष्टि
के
लिए
कम्पनी
के
राजनीतिज्ञ
एजेण्ट
के
रूप
में
नेपाल
की
राजधानी
काठमाण्डु
जाने
के
कारण
उनके
सहायक जार्ज विलियम
ट्रेल
(George William Trail) को कुमाऊँ
गढ़वाल
के
द्वितीय
आयुक्त के
रूप
में
प्रोन्नति
मिली।
ट्रेल
ने
कुमाऊँ
गढ़वाल
में
20 वर्ष
सेवा
दी
जिसमें
लगभग
19 वर्ष
तक
वे
यहाँ
के
आयुक्त
रहे।
उन्हें कुमाऊँ का
प्रथम
वास्तविक
आयुक्त
भी
माना
जा
सकता
है क्योंकि
उनके
कार्यकाल
में
ही
यहाँ
प्रशासन
के
वास्तविक
स्वरूप
की
आधारशिला
रखी
गई।
ट्रेल ने प्रशासन के सभी क्षेत्रों में अपनी व्यक्तिगत रूचि दिखाई। उन्होंने सामान्य प्रशासन, राजस्व प्रशासन, पर्वतीय श्रमिकों की समस्याओं, ब्रिटिश कुमाऊँ प्रान्त की राजनैतिक एवं प्रशासनिक सीमाओं के निर्धारण, सड़क एवं पुलो के निर्माण, वन व्यवस्था, पोस्टल सेवाओं एवं कोषागार और मुद्रा विनियम इत्यादि मामलों में व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप किया। उन्होने पिछले 25 वर्षों से चली आ रही गोरखा राजस्व व्यवस्था के स्थान पर स्थानीय परिस्थितियों एवं पूर्व परम्पराओं के अनुसार कुमाऊँ प्रान्त का 26 परगनों में विभाजन किया। अस्सी के बंदोबस्त के रूप में राजस्व का ग्रामवार राजकीय अभिलेखों में अंकन कराया। इस बंदोबस्त ने प्रथम बार ग्रामीणों को उनके गाँव की सीमा, सीमा में समाहित भूमि, वन एवं नैसर्गिक सम्पदा की जानकारी प्राप्त हुई।
माह अक्टूबर, 1816 ई0 को इस क्षेत्र को बोर्ड ऑफ कमिश्नर के नियंत्रण में कर दिया गया था। ट्रेल ने उत्तराखण्ड को एक नई व्यवस्था दी जो वर्तमान में भी इस राज्य की विशिष्ट पहचान है। उन्होंने नानकर भूमि के अधिग्रहण से प्राप्त बचत की राशि से 1819 में पटवारी के 9 पद सृजित किए। यह एक प्रकार से राजस्व पुलिस व्यवस्था थी। पटवारी का पद पर्वतीय क्षेत्रों के प्रशासन में अत्यंत महत्वपूर्ण पाया गया। उसका कार्य अपने क्षेत्र से लगान की वसूली करना, गाँव की पैमाइश करना, लड़ाई-झगड़ों का स्थानीय निपटारा करना, सदर कचहरी को सूचना प्रदान करना एवं तहसीलदारों को सूचना पहुँचाना इत्यादि था। एक प्रकार से पटवारी ग्रामीण क्षेत्र में राजस्व एवं पुलिस दोनो के कार्य करता था।
ट्रेल
ने
अपने
कार्यकाल
में
कुल
7 बंदोबस्ती
चक्र
पूर्ण
किए।
उन्होनें
कुमाऊँ
की
अत्यंत
दयनीय
अर्थव्यवस्था
की
समीक्षा
की।
ट्रॉन्स
हिमालयी
व्यापार
के
अन्तर्राष्ट्रीय
महत्व
को
समझा
और
उसे
अनुकूल
बनाने
के
विशिष्ट
उपाय
किए।
निजी
यात्रा
मार्गों
को
यात्री
मार्ग
में
परिवर्तित
कर
बद्रीनाथ-केदारनाथ
तक
चरणबद्ध
सड़क
निर्माण
आरम्भ
करवाया।
व्यापारिक
सीमावर्ती
भोटिया
जाति
को
लगान
माफी
के
साथ
ही
परम्परागत
मेलों
के
आयोजन
स्थल
पर
ही
व्यापारिक
मुकदमों
की
सुनवाई
का
प्रयास
किया।
इससे
व्यापारियों
और
कृषकों
का
उत्साह
बढ़ा
जिसका
प्रमाण
ट्रेल
के
सात
बंदोबस्तों
की
वित्तीय
सफलता
के
आकड़ों
से
होता
है।
कुमाऊँ की प्रशासनिक सीमा निर्धारण में ट्रेल का मुरादाबाद के कलेक्टर हाल हेड से लम्बा विवाद चला
जिसका
निस्तारण
1825 में
बोल्डरसन्की
अध्यक्षता
में
हुआ।
सन्
1826 ई0
में
देहरादून
व
चंडी
क्षेत्र
को
कुमाऊँ
में
शामिल
किया
गया।
1 मई
1829 तक
देहरादून
कुमाऊँ
प्रांत
का
हिस्सा
रहा।
1820 ई0
में
ट्रेल
ने
कोर्ट
फीस
के
रूप
में
स्टॉम्प
जारी
किए।
अतः ट्रेल ने कुमाऊँ के उजड़े प्रान्त में पुनः एक व्यवस्था कायम की। विश्प हीबर नामक यात्री जो 1824 ई0 में उत्तर भारत भ्रमण पर आए थे, उन्होंने अपने संस्मरण में लिखा है कि कमिश्नर ट्रेल निरन्तर भ्रमण पर रहते थे एवं केवल वर्षाकाल को ही अपने मुख्यालय में व्यतीत करते थे। केनेय मेंसन
ने
लिखा
है
कि
स्वयं
ट्रेल
को
अनुमान
न
रहा
होगा
कि
कालान्तर
में
पर्वतीय
जन
किसी
विवाद
का
निर्णय
करेगें
तो
उदाहरण
देगें
कि
कमिश्नर
ट्रेल
के
जमाने
में
ऐसा
होता
था।
§ कुमाऊँ का पहला कमिश्नर – ई0 गार्डनर को 1815 ई0 में
§ ई0 गार्डनर ने अपने 9 माह के कार्यकाल में सात तहसीलों और पाँच थानों की स्थापना की।
§ कुमाऊँ गढ़वाल के द्वितीय आयुक्त – जार्ज विलियम ट्रेल
§ ट्रेल ने कुमाऊँ गढ़वाल में 20 वर्ष सेवा दी जिसमें लगभग 19 वर्ष तक वे यहाँ के आयुक्त रहे।
§ ट्रेल को कुमाऊँ का प्रथम वास्तविक आयुक्त भी माना जा सकता है क्योंकि उनके कार्यकाल में ही यहाँ प्रशासन के वास्तविक स्वरूप की आधारशिला रखी गई।
§ ट्रेल ने अस्सी के बंदोबस्त के रूप में राजस्व का ग्रामवार राजकीय अभिलेखों में अंकन कराया।
§ ट्रेल ने अपने कार्यकाल में कुल 7 बंदोबस्ती चक्र पूर्ण किए।
§ कुमाऊँ की प्रशासनिक सीमा निर्धारण में ट्रेल का मुरादाबाद के कलेक्टर हाल हेड से लम्बा विवाद चला जिसका निस्तारण 1825 में बोल्डरसन्की अध्यक्षता में हुआ।
§ सन् 1826 ई0 में देहरादून व चंडी क्षेत्र को कुमाऊँ में शामिल किया गया।
§ 1
मई 1829 तक देहरादून कुमाऊँ प्रांत का हिस्सा रहा।
§ 1820
ई0 में ट्रेल ने कोर्ट फीस के रूप में स्टॉम्प जारी किए।
उत्तराखंड में लुशिंगटन व बैटन के शुधार
कर्नल जार्ज गोबान
§ कुमाऊँ के तृतीय कमिश्नर के रूप में कर्नल जार्ज गोबान की अप्रैल 1836 में नियुक्ति हुई।
§ शीतकालीन भ्रमण पर आए बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य राबर्ट मार्टिन्स बर्ड ने अपनी रिपोर्ट में गोबान की आलोचना की। साथ ही बर्ड ने कुमाऊँ को उत्तरी पश्चिमी प्रान्त की भांति मुख्य धारा में लाने के लिए रेगुलेशन 1833 के अनुरूप बंदोबस्त करने, अधीनस्थ कर्मचारी निर्धारण, असम की भाँति कुमाऊँ कोड निर्माण सम्बन्धी 16 सुझाव भी दिए।
§ सितम्बर 1838 ई0 तक कार्यरत कमिश्नर गोबान के कार्यकाल में दास प्रथा का अंत हुआ।
§ गोबान के काल में स्थानीय लोगों ने गोवध के विरूद्ध अपने स्वर मुखर किए।
§ 1836
ई0 में काशीपुर को मुरादाबाद और तराई क्षेत्र को रुहेलखण्ड में शामिल किया गया।
§ गोरखाकाल में स्थापित न्याय की ‘दिव्य’ व्यवस्था का अंत हुआ।
जार्ज लुशिंगटन
§ कुमाऊँ का रेगुलेशन प्रान्तों की भाँति एक नियमित प्रांत बनाने को अधिनियम- 10 (Act – 10) अप्रैल 1838 ई0 में प्राख्यापित हुआ।
§ इस नयी व्यवस्था के तहत प्रथम कमिश्नर जार्ज लुशिंगटन बने।
§ उन्होने अपने दस वर्ष के कार्यकाल में नैनीताल शहर की स्थापना के साथ ही राजस्व, वन, भाबर-तराई प्रबन्धन, शिक्षा, सड़क निर्माण इत्यादि पर मूलभूत कार्य किया।
§ इनके कार्यकाल में बैटेन को बंदोबस्ती अधिकारी बनाया गया जिन्हें बंगाल रेगुलेशन और 1833 के उत्तर-पश्चिमी प्रान्त रेगुलेशन के अनुरूप गढ़वाल एवं कुमाऊँ का बंदोबस्त करना था।
§ सामान्यतः 1833 के रेगुलेशन के तहत हुए बंदोबस्त को ‘बैक प्रोसेस बंदोबस्त’ कहा जाता हैं।
§ इस बंदोबस्त में राजस्व महाल की देय क्षमता का आंकलन भूमि की उर्वरता, कृषकों की क्षमता एवं वित्तीय स्थिति के अनुरूप तय कर राजस्व महाल के कृषकों में अलग-अलग निर्धारित कर दिया जाता है।
§ प्रत्येक राजस्व महाल की सीमाएं भी बंदोबस्त में लिखित रूप से निर्धारित कर दी गई।
§ यह ब्रिटिश कुमाऊँ का आठवां बंदोबस्त था।
§ इसी दौरान बर्ड और लेफ्टिनेंट गर्वनर थॉमसन के पर्यवेक्षण में राजस्व प्रशासन की आधारशिला रखी गई जो कि थोड़े बहुत परिवर्तनों के साथ वर्तमान में भी प्रभावी है।
§ इसी काल में महत्वपूर्ण निर्देश ‘डाइरेक्शन फॉर क्लेक्टर्स ऑफ रेवन्यू’ और ‘डाइरेक्शन फॉर सेटिलमेण्ट ऑफिसर्स’ भी निकले।
§ कलेक्ट्रेट कार्यालय, रिकॉर्ड ऑफिस, पटवारी रिकॉर्ड, गुजारी रजिस्टर, वैस्ट लेण्ड, परगना रजिस्टर, भूमि की बिक्री, नूजल भूमि, तकावी, खाम, तहसील एकाउंट जैसी अभिलेखीय व प्रक्रियात्मक व्यवस्थाएँ स्थापित हुई।
§ बर्ड की अनुशंसा पर तराई-भावर में द्वैध शासन व्यवस्था लगी।
§ लुशिंगटन ने कुमाऊँ में असम रूल्स को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप बनाने की दिशा में अपने सुझाव दिए।
§ सदर की दीवानी एवं निजामत अदालतों ने उसके सुझावों के माध्यम से संशोधित नियमों की श्रृंखला जारी की जिन्हें बाद में ‘कुमाऊँ प्रिंटेड रूल्स’ कहा गया।
§ वर्तमान में भिन्न-भिन्न विभागों द्वारा सरकार को वार्षिक प्रतिवेदन भेजे जाते है, ज्ञातव्य हो की यह व्यवस्था लुशिंगटन के कार्यकाल में 1839 में कुमाऊँ से ही प्रारम्भ हुई।
§ इस काल में शिक्षा के क्षेत्र में सीनियर असिस्टेंट हडलस्टन द्वारा लावारिस फंड से श्रीनगर में 1839 ई0 में एक स्कूल स्थापित किया गया।
§ इसी काल में बद्री-केदार यात्रा मार्ग पर अप्रैल 1840 में असिस्टेंट सर्जन की तैनाती हुई।
§ कालान्तर में अक्टूबर 1947 में नैनीताल में भी सर्जन नियुक्त हुआ एवं चिकित्सा क्षेत्र में सुधार हेतु 1848 ई0 को कमिश्नर की अध्यक्षता में एक डिस्पैन्सरी कमेटी गठित की गई।
§ सम्पर्क मार्ग निर्माण की दिशा में 1845 ई0 में खैरना-नैनीताल मार्ग का कार्य आरम्भ हुआ।
§ बागेश्वर में गोमती पर पुल निर्माण का कार्य स्वीकृत हुआ जो सितम्बर 1848 तक तैयार भी हो गया।
§ अक्टूबर 1848 ई0 में अपने आकस्मिक निधन से पूर्व लुशिंगटन ने कुमाऊँ के प्रशासन को एक नई दिशा प्रदान कर दी थी।
§ कवि गुमानी पंत ने लुशिंगटन की प्रशंसा में कुछ छंदों की रचना की।
बैटेन
§ लुशिंगटन की मृत्यु के उपरान्त नवम्बर 1848 को बैटेन ने पूर्णकालिक कमिश्नर के रूप में कार्यभार ग्रहण किया।
§ अब तक उन्हे इस पर्वतीय प्रदेश में 12 वर्ष का अनुभव हो चुका था।
§ उसे जॉन स्ट्रेची और हेनरी रेमजे जैसे सीनियर एसिस्टेंट कमिश्नरों के कार्यों के सुपरिणाम भी मिलने लगा।
§ इस काल में राजस्व, सामान्य प्रशासन एवं कमिश्नरी कार्यालय को स्थान्तरित कर नैनीताल में स्थापित किया गया।
§ खसरा सर्वेक्षण आधारित राजस्व बंदोबस्त लागू किया।
§ प्रशिक्षित पटवारियों की तैनाती, तहसीली स्कूलों एवं डाक बंगलो का निर्माण उनकी मुख्य उपलब्धियों में शामिल है।
§ सन् 1852-53 में चाय की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए जमीनें प्रदान की गई।
§ पुलिस दीवानी और फौजदारी प्रशासन में गुणात्मक सुधार एवं परिवर्तन इनके काल में हुए।
§ बैटेन ने नैनीताल को न केवल कमिश्नरी मुख्यालय के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया अपितु इसे लोकप्रिय पर्यटक नगरी बनाने के लिए भी मौलिक प्रयत्न किए।
उत्तराखंड में हेनरी रामजे के सुधार
हेनरी रामजे
§ हेनरी रामजे ने लगभग 44 वर्षों तक विभिन्न पदों पर ब्रिटिश कुमाऊँ में कार्य किया।
§ इसमें से 28 वर्ष वे कुमाऊँ के छठे कमिश्नर रहे।
§ इसके अतिरिक्त वे वरिष्ठ सहायक कमिश्नर गढ़वाल और कुमाऊँ के पद पर भी कार्यरत रहे।
§ 1857
के विद्रोह से 15 माह पूर्व उन्हें कुमाऊँ के कमिश्नर पद पर नियुक्ति मिली थी।
§ रामजे मूलतः स्कॉटलैंड के निवासी और लॉर्ड डलहौली के चचेरे भाई थे।
§ लुशिंगटन की बेटी से इनका विवाह हुआ था।
§ ईसाई मत के वे बड़े प्रचारक थे।
§ पहाड़ी भाषा भी बोल लेते थे एवं कृषकों के घर की मंडवे की रोटी भी खा लेते थे।
§ सम्पूर्ण कुमाऊँ में ‘रामजी साहब’ के नाम से लोकप्रिय हुए।
§ अंग्रेज लेखकों ने तो उन्हें ‘कुमाऊँ का राजा’ की संज्ञा से भी विभूषित किया है।
§ 1884
ई0 में सेवानिवृत्त हुए और 1892 तक अल्मोड़ा में ही रहे।
§ रामजे नवाबी तरीके से शासन करते थे। वे चार माह विन्सर, चार माह अल्मोड़ा तथा चार माह भावर में रहते थे।
§ उनका सबसे प्रशंसनीय कार्य तराई-भावर को आबाद करना था।
§ उनके प्रयासों से इस क्षेत्र में मलेरिया का प्रकोप कम हुआ।
§ सड़को, नहरों एवं नगरों के विकास के साथ ही तराई-भावर में खेती का खूब विस्तार हुआ।
§ लॉर्ड मेयो जब कुमाऊँ आए तो उन्होंने रामजे के तराई-भावर प्रबन्धन की खूब प्रंशसा की।
§ 1857
के सैनिक विद्रोह के अवसर पर रामजे के अधीन यह क्षेत्र अपेक्षाकृत शांत रहा।
§ बरेली एवं रूहेलखण्ड के अधिकारियों और यूरोपियों ने मई 1858 तक नैनीताल में प्रवास किया।
§ सैन्य विद्रोह की अवधि में विद्रोह के केन्द्र के इतने निकट होते हुए भी रामजे कुमाऊँ, टिहरी क्षेत्र में शान्ति बहाल रखने में सफल रहे। इसी कार्य के पुरस्कार स्वरूप वे अगले 26 वर्षों तक कुमाऊँ के निर्बाध शासक रहे।
§ रामजे ने बैकेट को बंदोबस्त का कार्य सौंपा क्योंकि बैटन का 8वाँ बंदोबस्त 20 वर्षों के लिए था और 1860 ई0 में इसकी अवधि समाप्त हो रही थी।
§ बैकेट द्वारा किया गया बंदोबस्त गढ़वाल-कुमाऊँ का एक ही अधिकारी द्वारा किया गया अन्तिम बंदोबस्त था।
§ इसमें गढ़वाल के 4392 व कुमाऊँ के 6333 ग्रामों की पैमाइश हुई।
§ खाम स्टेट प्रबन्धन के माध्यम से रामजे को सफल वन प्रबन्धन का श्रेय जाता है।
§ रामजे ने 1861 में हिमालय के तराई क्षेत्र के जंगलों की विस्तृत रिपोर्ट तैयार करवाई।
§ रामजे साहब 1868 ई0 तक कुमाऊँ कमिश्नर के साथ-साथ वन संरक्षक भी रहे।
इस प्रकार हम पाते हैं कि कुमाऊँ पर 1815 ई0 से लेकर स्वतन्त्रता प्राप्ति तक क्रमशः गार्डनर, ट्रेल गोबान, लुशिंगटन, बैटन, रामजे, फिशर, रौस, ग्रिग, अर्सकिन, रावस, डेभिस, ग्रेसी, कम्पबैल, बिनढक, स्टाइफ, ओयन और इबॅस्टन महोदय ने कमिश्नर के पद पर कार्य किया। कुछ लोगों ने अस्थायी कमिश्नर के तौर पर भी कार्यभार ग्रहण किया था। उनकी सूची उपलब्ध नहीं हैं। जो भी हो एक बात साफ है कि लगभग सभी शासकों ने
इस
क्षेत्र
में
एकतंत्र
की
ही
स्थापना
की।
ब्रिटिशकालीन न्याय एवं पुलिस व्यवस्था
चंद राजाओं
के
समय
में
पुलिस
प्रबन्ध
थोकदारों
व
प्रधानों
के
हाथों
में
होता
था।
तराई
क्षेत्र
में
मेवाती
व
हेड़ी
मुस्लमान
पुलिस
का
कार्य
सम्पन्न
करते
थे। गोरखों का
शासन
फौजी
था।
अतः
सैन्य
अधिकारी
ही
यह
कार्य
भी
देखता
था। अंग्रेजी शासन काल
की
स्थापना
के
साथ
ही
इस
क्षेत्र
में
पुलिस
व्यवस्था
का
एक
सुदृढ़
ढाँचा
तैयार
हुआ।
यद्यपि
तराई
क्षेत्र
में
अंग्रेजो
ने
हेड़ी
व
मेवातियों
को
प्रारम्भ
में
इस
कार्य
को
ठेके
पर
दिया।
इन
लोगों
को
ठेका
था
कि
वे
इस
इलाके
में
चोरी
डकैती
न
होने
देगें
और
यदि
हुई
तो
माल
पूरा
करेंगे।
किन्तु डिप्टी सुपरिटेन्डेन्ट
शेक्सपियर
की
रिपोर्ट
के
बाद
सन्
1813 ई0 में
यह
व्यवस्था
बंद
कर
दी
गई और
प्रत्येक
घाटों
पर
कुमाऊँनी
बटालियन
के
लोग
रखे
गए।
भाबर–तराई
में
जंगलो
के
मध्य
लीकें
काट
दी
गई
जिनमें
सवार
पहरा
दिया
करते
थे।
सामान्यतः पहाड़ी जिले अपराधिक नहीं समझे जाते थे। इसलिए साधारण पुलिस (Regular Police) यहाँ
पर
पहले
से
भी
नहीं
थी।
ट्रेल
ने
स्वयं
स्वीकार
किया
है
कि
– ‘इस
प्रांत
में
अपराधों
की
संख्या
कम
होने
से
फौजदारी
पुलिस
की
कोई
आवश्यकता
नहीं
है। कत्ल को
यहाँ
कोई
जानता
नहीं।’ चोरी
व
डकैती
बहुत
कम
होती
है।
अंग्रेजी
राज्य
स्थापित
होने
से
लेकर
अब
तक
जेल
में
12 से
ज्यादा
कैदी
कभी
नहीं
हुए
और
उनमें
भी
अधिकत्तर
मेदानी
क्षेत्रों
से
है।
यहाँ
पर
मौतों
का
कारण
सर्पदंश,
जानवर
से
अथवा
आत्महत्या
से
होती
थी।
स्त्री
सम्बन्धी
मुकदमें
ज्यादा
होते
थे।
1824 ई0
में
दास
प्रथा
के
अंत
और
1829 में
सती
प्रथा
के
अंत
के
साथ
इनमें
भी
कमी
आई।
पहाड़ों
में
अल्मोड़ा
का
थाना
सबसे
प्राचीन
है
जो
1837 ई0 स्थापित
हुआ। इसके
पश्चात
क्रमशः
1843, 1869 ई0
ने
नैनीताल
और
रानीखेत
में
थाना
स्थापित
हुए।
अंग्रेजों
ने
यात्रा
मार्ग
पर
पुलिस
व्यवस्था
की।
मोटरमार्ग
के
निर्माण
के
बाद
इन
पर
भी
ट्रेफिक
पुलिस
चौकियाँ
स्थापित
की
गई।
पहाड़ों में कम खर्च पर पुलिस व्यवस्था का सर्वोत्तम तरीका ट्रेल ने निकाला। उन्होंने पटवारी के रूप में राजस्व पुलिस की स्थापना कर ग्रामीण क्षेत्र में पुलिस के सामान्य कार्यों को इस पद में निहित कर दिया। इस संदर्भ में रामजे की राय विशेष है। कि- “मै समझता हूँ कि हमारा गाँव सम्बन्धी पुलिस का तरीका भारत में सबसे अच्छा है। यह ग्राम पुलिस सस्ती है। इसमें सरकार का कुछ भी खर्च नहीं होता।” यद्यपि इस व्यवस्था में पटवारी, पेशकार, पंच, पतरौल इत्यादि सीधे-साधे व अशिक्षित जनता का अधिकाधिक शोषण करते थे। 1920-22 के
असहयोग
आन्दोलन
के
बाद
पटवारी
की
स्थिति
में
परिवर्तन
आया।
साक्षरता
बढ़ने
से
कुमाऊँ
के
लोग
अब
पहले
जैसे
सीधे
न
रहे।
स्थानीय
जनता
में
आई
जागरूकता
के
कारण
अब
पटवारी
को
वसूली
में
मुश्किलों
का
सामना
करना
पड़ा।
उसकी
शक्तियाँ
कम
पड़ने
लगी
और
पट्टी
से
उसका
दबदबा
न्यून
होने
लगा।
1925 ई0
के
गजेत्यिर
में
इसलिए
परिशिष्ट
लिखा
गया
कि
अब
रामजे
साहब
की
राय
में
संशोधन
होना
जरूरी
है।
सामान्यतः ब्रिटिश राजकाल में सारे प्रान्त की पुलिस व्यवस्था इन्सपैक्टर-जनरल के हाथों में होती थी जिसके अधीन सुपरिटेन्डेन्ट, डिप्टी
सुपरिटेडेन्ट,
इन्सपैक्टर
सब-इन्सपैक्टर
होते
थे।
कमोबेश
पुलिस
का
यही
ढाँचा
बिना
परिवर्तन
के
अब
भी
जारी
है।
न्याय
व्यवस्था
के
तहत
वर्ष
1838 ई0
के
नियम-10
के
तहत
जिले
के
पश्चिमकोत्तर
भाग
में
सदर
दीवानी
अदालत,
सदर
निजामत
अदालत
और
सदर
बोर्ड
माल
के
अधीन
हुए।
बोर्ड
ऑफ
रेवेन्यू
इस
क्षेत्र
में
मालगुजारी
के
विषय
का
अधिष्ठाता
था।
इस
सम्बन्धी
मामलों
की
सुनवाई
केवल
माल
की
कचहरियों
में
ही
होती
थी।
सन्
1894 ई0
तक
कुमाऊँ
कमिश्नर
ही
न्याय
का
सर्वेसर्वा
था।
उसे
फांसी
देने
तक
का
अधिकार
था
जिसकी
अपील
हाईकोर्ट
में
नहीं
हो
सकती
थी।
1894 ई0
से
1914 ई0
तक
सेशन
जज
के
कोर्ट
खुले।
वर्ष
1914 ई0
में
न्याय
विभाग
पृथक
हो
गया
और
इनका
सीधा
सम्बन्ध
उच्च
न्यायालय
से
हो
गया।
पहला मुंसिफ वर्ष 1929 ई0 में नियुक्त हुआ। कमिश्नर के रिश्तेदार को सदर अमीन बनाया गया। 1838 ई0 में ये पद समाप्त कर दिए गए। अधिनियम 10, 1838 के
अनुसार
कुमाऊँ
को
गढ़वाल
एवं
कुमाऊँ
दो
प्रान्तों
में
विभक्त
किया
गया।
एक-एक
सिनियर
असिटेण्ट
कमिश्नर
और
सदर
अमीन
नियुक्त
हुए।
मुसिंफ
के
अधिकार
तहसीलदार
पद
में
निहित
कर
दिए
गए।
उत्तराखंड में आधुनिक शिक्षा का विकास
ट्रेल लिखते है कि ”कुमाऊँ
में आम
स्कूल नहीं
हैं। और
निजी स्कूलों
में केवल
उच्च वर्ण
के लोगों
को ही
शिक्षा मिलती
है। पढ़ाने
का कार्य
ब्रह्मण करते
है। उच्च
शिक्षा के
लिए काशी
भेजे जाते
है। हिन्दु
शिक्षा पद्धति
के अनुसार
ही शिक्षा
दी जाती
है।” गोरखा
काल
में
शिक्षा
का
ह्मस
हुआ
फिर
भी
अंग्रेजी
आधिपत्य
के
समय
कुमाऊँ
में
129 हिन्दी
व
संस्कृत
की
पाठशलाएँ
थी। सर्वप्रथम अंग्रेजों
ने
एक
स्कूल
श्रीनगर
गढ़वाल
में
1840 ई0 में
शुरू
किया। कालान्तर
में
कलकत्ता
शिक्षा
समिति
की
सिफारिश
पर
दो
और
स्कूल
भी
खुले। 1841
ई0 में
शिक्षा
विभाग
की
स्थापना
की
गई
और
कई
स्कूलों
की
स्थापना
हुई।
§ सर्वप्रथम 1871 ई0 में पO बुद्धिबल्लभ पंत शिक्षा इन्सपैक्टर बने।
§ इस काल में 2 मिडिल स्कूल 166 स्कूल खुले जिनमें छात्र संख्या 8488 थी।
§ कुमाऊँ में आधुनिक शिक्षा की जड़ जमाने में बुद्धिबल्लभ का बड़ा योगदान है।
§ 1844
में एक मिशन स्कूल खुला जो 1871 ई0 में रामजे कालेज बना।
§ यही स्कूल कुमाऊँ में अंग्रेजी शिक्षा का श्रीगणेश करने वाला स्कूल है।
§ रामजे कामचलाऊ शिक्षा दिए जाने के पक्षधर थे।
§ 1923
ई0 के पश्चात् स्वराज दल के सदस्य शिक्षा बोर्ड में शामिल हुए। अब शिक्षा के प्रसार में तेजी आई। चूंकि नैनीताल का जिले के रूप में गठन 1841 ई0 हुआ। इसके पश्चात् ही यहाँ शिक्षा का विकास संभव हो पाया।
संक्षेप
में,
उत्तराखण्ड
में
आधुनिक
प्रशासनिक,
न्यायिक,
राजस्व
एवं
शिक्षा
व्यवस्था
का
विकास
अंग्रेजी
राज्य
की
स्थापना
के
साथ
ही
हुआ।
इस
प्रक्रिया
से
धीरे-धीरे
इस
क्षेत्र
की
जनता
में
जागरूकता
आई
और
प्राशसनिक
कुप्रबन्ध,
जंगलात
कानून,
बुरी
व्यवस्थाओं
के
विरूद्ध
जनता
ने
आवाज
उठानी
शुरू
की।
राजनीतिक
संस्थाओं
का
विकास
हुआ।
राष्ट्रीय
आन्दोलन
में
भागीदारी
प्रारम्भ
हुई।
काग्रेस
की
स्थापना
इस
दिशा
में
महत्वपूर्ण
प्रयास
था।
वर्तमान
उत्तराखण्ड
राज्य
में
अधिकांश
व्यवस्थाओं
का
श्रीगणेश
इसी
काल
में
हुआ।
उत्तराखंड के कुमाऊँ कमिश्नर
(Kumaon Commissioner of Uttarakhand)
1. ई0 गार्डनर (सन् 1815 – 16 ई०)
§ ई0 गार्डनर कुमाँऊ के प्रथम कमिश्नर थे।
§ पहला ब्रिटिश कालीन भूमि बंदोबस्त।
§ अल्मोड़ा से श्रीनगर तक डाक व्यवस्था लागू की।
§
2. जी0 डब्ल्यू ट्रेल (सन् 1816 – 30 ई०)
§ कुमाऊँ का प्रथम वास्तविक कमिश्नर।
§ 1816
में सम्पूर्ण उत्तराखंड में डाक सेवा लागू की।
§ 1816
में अल्मोड़ा जेल की स्थापना की।
§ 1817
में दून को सहारनपुर में शामिल किया।
§ 1819
में पटवारी पद का सृजन किया।
§ 1821
में पौड़ी जेल की स्थापना की।
§ 1822
में कुमाँऊ में आबकारी विभाग की स्थापना।
§ 1823
में कुमाऊँ के 26 परगनों में विभाजित किया।
§ विलियम ट्रेल के शासन काल मे अस्सीसाला भूमि बंदोबस्त किया गया।
§ कुमाँऊ की सीमा का प्रथम बार निर्धारण।
3. कर्नल गोबन (सन् 1830 – 39 ई०)
§ दास प्रथा, बाल विक्रय व महिला विक्रय प्रथा का अंत किया व अपराध घोषित किया
4. लशिगटन (सन् 1839 – 47 ई०)
§ ब्रिटिश गढ़वाल जो सन् 1815 से सन् 1839 तक कुमाऊँ कमिश्नरी की एक तहसील था, को सन् 1839 में जनपद का दर्जा मिला और अपनी जलवायु के अनुकूल अंग्रेज़ श्रीनगर से मुख्यालय पौड़ी ले गये। कुमाऊँ व गढ़वाल जिलों के लिये अलग-अलग असिस्टेंट कमिश्नरों की नियुक्ति की गई।
5. जे0 एन0 बैटन (सन् 1848 – 56 ई०)
§ 1854
में नैनीताल को कुमाँऊ कमिश्नरी का मुख्यालय बनाया गया।
§ बैटन के शासन के आरम्भ में दास प्रथा का अन्त कर दिया गया।
§ भूमापन का कार्य नये सिरे से आरम्भ हुआ।
§ इनके शासन काल को कुमाँऊ कमिश्नरी का स्वर्ण काल भी कहा जाता है।
6. सर हैनरी रामजे (सन् 1856 – 84 ई०)
§ हैनरी रैमजे स्कॉटलैंड का निवासी था और डलहौजी के चचेरे भाई थे।
§ रामज़ै के कार्यकाल में सन् 1857 ई. को भारत की स्वतन्त्रता का आन्दोलन हुआ था।
§ इनके शासन काल को ब्रिटिश काल का स्वर्ण काल कहा जाता है।
§ कुमाँऊ का बेताज बादशाह कहा जाता है।
§ कुमाँऊ में राजा रामजी के नाम से प्रसिद्ध थे।
§ कुमाँऊ के सबसे लोकप्रिय कमिश्नर थे।
§ 1863
में बिकेट बंदोबस्त (10वां भूमि बंदोबस्त) किया गया जिसमें पहली बार वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया गया।
§ सन् 1872 में पहली कार्ट सड़क रामनगर तथा रानीखेत को जोड़ती हुयी बनायी गयी।
§ सन् 1884 में काठगोदाम तक रेलमार्ग को बनाया गया।
§ रामज़ै ने पहली बार कुमाऊँ में आलू की खेती की शुरूआत करायी।
7. फिशर (सन् 1884 – 85 ई०)
8. एच० जी० रौस (सन् 1885 – 87 ई०)
§ 1885
में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई।
§ 1887
में गढ़वाल राइफल की स्थापना हुई।
9. जे0 आर0 ग्रिग (सन् 1888 – 89 ई0)
§ 1889
में हतियारों को रखने के लिए लाइसेंस नीति अपनाई।
10. जी0 ई0 अर्सकिन (सन् 1889 – 92 ई०)
§ 1891
में नैनीताल जनपद के गठन हुआ।
11. डी0 टी0 रौबर्ट्स (सन् 1892 – 94 ई०)
§ 1894
ई० में वन नीति लागू की।
§ 1893
में मुक्तेश्वर में पशु अनु० संस्थान की स्थापना।
12. ई0 ई0 ग्रिज (सन् 1894 – 98 ई०)
§ 1897
ई० में पहली बार पृथक उत्तराखंड प्रान्त की मांग महारानी विक्टोरिया के समकक्ष रखी गयी।
13. आर0 ई0 हैम्बलिन (सन् 1899 – 1902 ई०)
§ 1899-1900
ई० में दून में रेल का आगमन।
§ 1901
ई० गढ़वाल यूनियन की स्थापना।
§ 1902-1903
ई० नैनीताल जेल की स्थापना।
14. ए0 एम0 डब्लयू० शैक्सपियर (सन् 1903 – 05 ई०)
§ उत्तराखंड का प्रथम गढ़वाली समाचार पत्र का प्रकाशन 1905 ई० में हुआ।
15. जे0 एस0 कैम्पवेल (सन् 1906 – 05 ई०)
§ 1906ई० ग्लोगी परियोजना का कार्य पूरा हुआ यह देश की सबसे पुरानी जल विद्युत परियोजना है।
§ 1908
ई० कुली एजेंसी की स्थापना(जोधपुर सिंह नेगी द्वारा)।
§ 1909
ई० में कुमाऊँ गवर्मेंट गार्डन की स्थापना हुई।
§ 1912
ई० में अल्मोड़ा कांग्रेस की स्थापना।
§ 1913
ई० में अल्मोड़ा में होमरूल लीग की स्थापना हुई।
16. पर्सी विंढम (सन् 1914 – 24 ई०)
§ 1915
ई० में गांधी जी ने सर्वप्रथम हरिद्वार की यात्रा की।
§ 1916
ई० में गांधी जी ने देहरादून की यात्रा की।
§ 30
सितम्बर 1916 ई० में कुमाँऊ परिषद की स्थापना हुई।
§ 1921ई० में कुली बेगार प्रथा का अंत हुआ।
§ 1923
ई० में कुली एजेंसी की समाप्ति।
17. एन0 सी0 स्टिप्फ (सन् 1925 – 31 ई0)
§ 1929ई० में नायक बालिका रक्षा कानून बना।
§ 1929
ई० में गांधी जी ने कुमाँऊ की यात्रा की व हल्द्वानी,अल्मोड़ा ,बागेश्वर व कौसानी आदि स्थानों पर कई सभाएं की।
§ 23
अप्रैल 1930 को पेशावर कांड हुआ।
§ 30
मई 1930 ई० टिहरी रियासत में रंवाई कांड घटना घटित हुई।
18. एल0 एम0 स्टब्स (सन् 1931 – 33 ई०)
19. एल0 ओ0 गोयन (सन् 1933 – 35 ई०)
20. ए0 डब्लयू इवटसन (सन् 1935 – 39 ई०)
§ 1937 ई० में अल्मोड़ा के चनोदा नामक स्थान पर शांति लाल त्रिवेदी ने गांधी आश्रम की स्थापना की।
21. जी0 एल0 वीवियन (सन् 1939 – 41 ई०)
22. टी0 जे0 सी0 एक्टन (सन् 1941 – 43 ई०)
§ भारत मे भारत छोड़ो आंदोलन।
23. डब्लयू० डब्लयू फिनले (सन् 1943 – 47 ई०)
24. के0 एल0 मेहता (सन् 1947 – 1948 ई०)
§ कुमाँऊ का प्रथम भारतीय कमिश्नर।
§ कुमाँऊ कमिश्नरी स्वंतत्र।