Tuesday, August 11, 2026

History of British Rule in Utrakhand

 

उत्तराखण्ड में ब्रिटिश शासन का इतिहास (History of British rule in Uttarakhand)

उत्तराखण्ड में पन्द्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में छोटी-छोटी सामंतशाहियों का एकीकरण कर चंदपरमार शक्तियों ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया और कुमाऊँ तथा गढ़वाल के दो पृथक राज्यों की स्थापना की। राज्यों के बीच निरन्तर होने वाले युद्धों, बाह्य आक्रमणों आदि के कारण कला और संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो पाई किन्तु अन्य कई क्षेत्रों में युगान्तकारी परिवर्तन हुए। इस काल में स्थायी शान्ति व्यवस्था होने के बावजूद भी गोरखा युगीन अराजकता के दर्शन नहीं होते। 1815 के उपरान्त उत्तराखण्ड में औपनिवेशिक शासन के प्रवेश के साथ ही इस अंचल के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक स्वरूप में बदलाव आया। 

उत्तराखण्ड में ब्रिटिश आगमन के उद्देश्य एवं पृष्ठभूमि

उत्तराखण्ड में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के आगमन को उसके औपनिवेशिक और अन्वेषी नजरिये के आधार पर व्यापक परिदृश्य में देखने के प्रयास किए गए हैं। विभिन्न यूरोपीय यात्रियों जैसे देसीदेरी, मूरक्राफ्ट, कैप्टन हियरसे, फेजर आदि के विवरणों तथा अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के आधार शेखर पाठक ने 18वीं – 19वीं शताब्दी को हिमालय के संदर्भ में युगान्तरकारी बताते हुए कम्पनी के हिमालय आकर्षण तथा उत्तराखण्ड में घुसपैठ के प्रमुख उद्देश्यों को इस प्रकार चिह्नित किया है
1. ईसाई धर्म का प्रसार
2. कम्पनी तथा इंग्लैंड की औद्योगिक जरूरतों हेतु कच्ची सामग्री तथा बाजार ढूढना

3. नेपाल युद्ध के बाद सैन्य जातियों की खोज

4. हिमालय में छोटा इंग्लैंड बनाने का स्वप्न

5. नेपोलियन के कारण संभावित खतरे का क्षेत्र पश्चिमी हिमालय और काराकोरम होना

6. गोरखों के प्रति कुमाऊँ गढ़वाल तथा हिमाचल में मौजूद असन्तोष और गोरखों द्वारा बार बार कम्पनी क्षेत्र में घुसपैठ

7. उत्तराखण्ड की वन संपदा जिसमें कम्पनी को पर्याप्त लाभ प्राप्त होने की संभावना थी।

उत्तराखंड का प्रशासनिक पुनर्गठन – (ब्रिटिश कुमाऊँ, गढ़वाल)

1815 में गोरखों को पराजित करने के उपरान्त कम्पनी ने सिगौली की संधि से कुमाऊँ तथा गढ़वाल को ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा शासित क्षेत्र के अन्तर्गत ले लिया गया ओर एक पृथक प्रशासनिक इकाई के रूप में कुमाऊँ कमिश्नरी का गठन हुआ। वर्तमान देहरादून जिले का भू-भाग मेरठ कमिश्नरी के अन्तर्गत सहारनपुर जिले से संयुक्त किया गया। मन्दाकिनी और अलकनन्दा का पश्चिमी भाग (वर्तमान उत्तरकाशी और टिहरी जिले) राजा सुदर्शनशाह को दिया गया राजा ने भागीरथी और भिलंगना नदियों के बायें तट पर स्थित टिहरी नामक एक छोटे से गाँव को अपनी राजधानी बनाया। 1824 में रवाई परगने का कुछ भाग भी टिहरी में शामिल किया गया। 1825 में देहरादून तथा जौनसार को सहारनपुर से लेकर कुमाऊँ कमिश्नरी में सम्मिलित कर लिया गया, पर 1829 में पुनः कुमाऊँ से पृथक कर दिया गया। इस प्रकार 1815 में देहरादून के मेरठ कमिश्नरी से संयुक्त किए जाने के उपरान्त उत्तराखण्ड दो भिन्न सामाजिक-राजनीतिक इकाइयों में विभक्त दिखाई देता है- ब्रिटिश कुमाऊँ और टिहरी रियासत इनमें से ब्रिटिश कुमाऊँ के अन्तर्गत कुमाऊँ तथा गढ़वाल दोनों सम्मिलित थे। काफी समय तक कुमाऊँ गैर आइनी प्रदेश (Non Regulation Province) रहा। 

ब्रिटिश कुमाऊँ (गढ़वाल)

उत्तर में तिब्बत से लेकर दक्षिण में रुहेलखण्ड तक तथा पश्चिम में टिहरी राज्य से पूर्व में नेपाल तक विस्तृत लगभग 9600 वर्ग किमी. का भू-भाग इसके अन्तर्गत था। इस क्षेत्र पर औपनिवेशिक शासन के तेरह दशकों (1815-1947) में से जॉर्ज विलियम ट्रेल (1815-35), जे.एच. बैटन (1848-1856), तथा हेनरी रैमजे (1856-1884) का युग व्यापक निर्माण एवं परिवर्तनों का युग रहा। इस अवधि में विभिन्न बन्दोबस्तों के माध्यम से कुमाऊँ की प्रशासनिक इकाइयों और उनकी सीमाओं के पुनर्गठन के साथ-साथ भू-व्यवस्था को भी एक नया स्वरूप प्रदान किया गया। अगले छः दशकों में 17 कमिश्नर और हुए।

1815 में एडवर्ड गार्डनर को कुमाऊँ का प्रथम कमिश्नर नियुक्त किया गया, किन्तु छः माह बाद ही ट्रेल को कमिश्नर बनाया गया। ब्रिटिश कुमाऊँ के प्रशासनिक पदानुक्रम में कमिश्नर सर्वोच्च पदाधिकारी था।

1839 में कुमाऊँ कमिश्नरी को दो जिलों- कुमाऊँ तथा गढ़वाल में विभाजित किया गया। 1858 के भारत सरकार अधिनियम द्वारा भारतीय प्रशासन का नियंत्रण ईस्ट इण्डिया कम्पनी से ब्रिटिश क्राउन को सौंपे जाने के बाद प्रशासनिक दृष्टि से पहला परिवर्तन 1862 में तराई जिले के गठन के रूप में हुआ  1871 में देहरादून को सहारनपुर जिले से अलग करके एक स्वतंत्र जिला घोषित किया गया। 1891 में कुमाऊँ के छः तथा तराई के सात परगनों को मिलाकर नैनीताल जिले का और कुमाऊँ जिले के शेष भाग से अल्मोड़ा जिले का गठन किया गया।

1815 में प्रथम कमिश्नर एडवर्ड गार्डनर के समय यहाँ नौ तहसीलेंअल्मोड़ा, काली कुमाऊँ, पाली पछाऊँ, कोटा, सोर, फलदाकोट, रामगढ़, श्रीनगर और चाँदपुर थीं 1816 में द्वितीय कमिश्नर ट्रेल ने इन तहसीलों को अल्मोड़ा में मिलाकर इस नयी तहसील को हजूर तहसील नाम दिया। 1821 में सोर तहसील को समाप्त करके गंगोली को हजूर तहसील (अल्मोड़ा) में तथा सोर-सीरा और अस्कोट परगनों को काली कुमाऊँ से संयुक्त किया गया। 1823 . में साल अस्सी (संवत 1880) के बन्दोबस्त के माध्यम से ट्रेल ने प्रशासनिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन किए। इस समय तक तहसीलों की संख्या घटकर चार (हजूर, काली कुमाऊँ, श्रीनगर और चाँदपुर) रह गई। 1834 में ट्रेल ने श्रीनगर और चाँदपुर को एक तहसील में संयुक्त करके कैन्यूर को नई तहसील का मुख्यालय बनाया। 1839 में पृथक जिला बनने के बाद गढ़वाल में एक ही तहसील थी, जिसका मुख्यालय पौड़ी में था। 1840 के बाद कुमाऊँ जिले में एक तीसरी तहसील भाबर का गठन हुआ, जो संभवतः 19वीं शताब्दी के पाँचवें दशक तक बनी रही। कुछ समय के लिए इस तहसील को विघटित कर दिया गया और 1860 के बाद किसी वर्ष में पुनः भाबर तहसील का गठन करके हल्द्वानी में इसका मुख्यालय बनाया गया। 1891 में नैनीताल तहसील बनी। 1891 में तराई क्षेत्र में भी तीन तहसीलेंकाशीपुर, रुद्रपुर तथा किलपुरी थीं।

प्रारंभ में ब्रिटिश कुमाऊँ के पूर्वी क्षेत्र (कुमाऊँ) में कुल चौदह तथा पश्चिमी क्षेत्र (गढ़वाल) में कुल सत्रह परगने थे। 1821 में इनकी संख्या बढ़ाकर उन्नीस कर दी गई। गढ़वाल में कुछ परगनों को विघटित करके अन्य परगनों में सम्मिलित किया गया और सत्रह के स्थान पर कुल ग्यारह परगनों का सृजन हुआ। 1838-46 में बैटन के बन्दोबस्त में भी इनकी संख्या और स्थिति यथावत रही। 

ट्रेल के समय में कुमाऊँ के परगनों में कुल अस्सी (80) तथा गढ़वाल में कुल अड़तालीस (48) पट्टियाँ थीं। परंतु पट्टियों का निर्धारण भौगोलिक सीमाओं को ध्यान में रखकर नहीं किया गया था। हेनरी रैमजे के काल में बैकेट ने 1861-64 (गढ़वाल) तथा 1863, 73 (कुमाऊँ) में अपने तीस वर्षीय बन्दोबस्त (दसवें) के द्वारा इस क्षेत्र के परगनों में स्थित पट्टियों तथा उनके गाँवों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण और विभाजन इनकी भौगोलिक विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए किया। 1892-93 में पुनः पट्टियों की सीमाओं में कुछ परिवर्तन किए गए। इस परिवर्तन के बाद अल्मोड़ा जिले में 101, नैनीताल में 25 तथा गढ़वाल जिले में 77 पट्टियाँ विद्यमान थीं। बैकेट के बन्दोबस्त की अवधि 1902 . तक ही होने के कारण 1899 में गूज ने पुनरीक्षण कार्य किया परन्तु कुछ परगनों में कृषि भूमि की माप और कर संबंधी सुधारों को छोड़कर बेकेट द्वारा किए गए कार्यों में किसी भी प्रकार के परिवर्तन का प्रयास नहीं किया।

1857 और उत्तराखण्ड

1857 की घटनाओं ने उत्तराखण्ड को भी प्रभावित किया, पर यह प्रत्यक्ष रूप से इससे प्रभावित नहीं हुआ। यहाँ विरोधियों में कालू महरा, आनंदसिंह फत्र्याल, बिशन सिंह करायत के नाम उल्लेखनीय हैं। कमिश्नर रैमजे ने पर्वतीय भागों को इसके प्रभाव से रोकने के लिए पर्याप्त उपाय किए। ब्रिटिश गढ़वाल में पुराने वन ठेकेदार पदमसिंह नेगी तथा कमाऊँ के प्रवेश मार्गों पर धर्मानन्द जोशी को प्रभार सौंपा गया। प्रशासनिक सक्रियता से यहाँ स्थिति नियंत्रण में रही। तराई-भाबर का इलाका इससे पूरी तरह प्रभावित हुआ।

कुमाऊँ परिषद

1916 में गोविन्दबल्लभ पंत, हरगोविन्द पंत, चंद्रलाल शाह, बदरीदत्त पांडे आदि के प्रयासों से कुमाऊँ परिषद की स्थापना हुई, जिसका प्रथम अधिवेशन नैनीताल के मझेड़ा ग्राम में रायबहादुर नारायणदत्त छिपाल की अध्यक्षता में हुआ। 1916 से 1926 तक इसके सात अधिवेशन हुए। 1923 से परिषद ने कांग्रेस के कार्यक्रमों को अपना लिया

 

ब्रिटिश काल में उत्तराखण्ड का प्रशासनिक विकास

उत्तराखण्ड राज्य को गोरखों से हस्तगत करने के पश्चात् अंग्रेजों ने अपनी पूर्व नियोजित योजना के तहत इस विजित क्षेत्र का विभाजन दो भागों में कर दिया। 

§  अलकनन्दा नदी से पश्चिम के भाग पर गढ़ नरेश के वंशज सुदर्शनशाह को पुनः स्थापित किया जिसेटिहरी रियासतके नाम से जाना जाता है।

§  जबकि अलकनन्दा के पूर्व का गढ़वाल क्षेत्र एवं सम्पूर्ण कुमाऊँ क्षेत्र को सीधे ब्रिटिश नियंत्रण में लाया गया।

1839 में विभाजित होने से पूर्व इस सम्पूर्ण क्षेत्र को ब्रिटिश कुमाऊँ गढ़वाल के नाम से जाना जाता था। उत्तराखण्ड राज्य की वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्थाएँ कहीं कहीं इस काल में हुए प्रशासनिक प्रयोगों एवं परिवर्तनों का ही प्रतिफल है। सामान्यतः इस राज्य का प्रशासनिक विकास दो चरणों में हुआ। प्रथमतः गैर विनियमित क्षेत्र के रूप में एवं 1816 . के उपरान्त विनियमित क्षेत्र के रूप में इसके प्रशासनिक ढाँचे का संगठन किया गया। 1815 से 1861 0 के मध्य इस क्षेत्र को क्रमशः कुमाऊँ कमिश्नर तथा उत्तर पश्चिमी प्रान्त के लै0 गर्वनर के आदेशों से प्रशासित किया गया।

वर्तमान उत्तराखण्ड की प्रशासनिक व्यवस्थाएँ इस युग की ही देन है। पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण गैर विनियमित क्षेत्र के रूप में प्रयोग का यहाँ स्थायी प्रभाव पड़ा। उत्तराखण्ड राज्य की राजस्व पुलिस व्यवस्था इस युग की विशिष्ट देन है। वर्तमान में भी उत्तराखण्ड भारत वर्ष का एकमात्र राज्य जो पटवारी व्यवस्था द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों को संचालित करता है। मुख्यतः इस प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे का विकास प्रारम्भिक कमिश्नरों के निजी प्रयासों का प्रतिफल अधिक लगता है। इस कारण हमने उत्तराखण्ड के प्रशासनिक विकास का वर्णन निम्नॉकित तीन शीर्षकों के अधीन किया है

1.       गार्डनर एवं ट्रेल के सुधार

2.      लुशिगटन बैटन के सुधार

3.      रामजे के सुधार

उत्तराखंड में . गार्डनर एवं ट्रेल के सुधार

0 गार्डनर (E. Gardner) को 1815 0 में कुमाऊँ का पहला कमिश्नर नियुक्त किया गया। उनके सहायक के रूप में ट्रेल को नियुक्ति मिली। इसके साथ ही उत्तराखण्ड के प्रशासनिक नवाचार के एक नए युग का शुभारम्भ हुआ। अपने नौ महीनों के कार्यकाल में गार्डनर ने तहसीलों, थानों, सदर कार्यालय, भूराजस्व,नानकर भूमियों की जाँच इत्यादि का कार्य प्रारम्भ किया। सात तहसीलों और पाँच थानों की स्थापना की। सहायक ट्रेल को बंदोबस्त के कार्य में लगाया। यद्यपि इस बीच आंग्ल-नेपाल संघर्ष जारी था एवं गार्डनर राजनीतिज्ञ एजेण्ट की भूमिका भी इसमें निभा रहे थे। इस कारण उन्हें प्रशासन में सुधार का अधिक समय मिल पाया। 

गार्डनर को सिंगोंली की संधि की पुष्टि के लिए कम्पनी के राजनीतिज्ञ एजेण्ट के रूप में नेपाल की राजधानी काठमाण्डु जाने के कारण उनके सहायक जार्ज विलियम ट्रेल (George William Trail) को कुमाऊँ गढ़वाल के द्वितीय आयुक्त के रूप में प्रोन्नति मिली। ट्रेल ने कुमाऊँ गढ़वाल में 20 वर्ष सेवा दी जिसमें लगभग 19 वर्ष तक वे यहाँ के आयुक्त रहे। उन्हें कुमाऊँ का प्रथम वास्तविक आयुक्त भी माना जा सकता है क्योंकि उनके कार्यकाल में ही यहाँ प्रशासन के वास्तविक स्वरूप की आधारशिला रखी गई।

ट्रेल ने प्रशासन के सभी क्षेत्रों में अपनी व्यक्तिगत रूचि दिखाई। उन्होंने सामान्य प्रशासन, राजस्व प्रशासन, पर्वतीय श्रमिकों की समस्याओं, ब्रिटिश कुमाऊँ प्रान्त की राजनैतिक एवं प्रशासनिक सीमाओं के निर्धारण, सड़क एवं पुलो के निर्माण, वन व्यवस्था, पोस्टल सेवाओं एवं कोषागार और मुद्रा विनियम इत्यादि मामलों में व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप किया। उन्होने पिछले 25 वर्षों से चली रही गोरखा राजस्व व्यवस्था के स्थान पर स्थानीय परिस्थितियों एवं पूर्व परम्पराओं के अनुसार कुमाऊँ प्रान्त का 26 परगनों में विभाजन किया। अस्सी के बंदोबस्त के रूप में राजस्व का ग्रामवार राजकीय अभिलेखों में अंकन कराया। इस बंदोबस्त ने प्रथम बार ग्रामीणों को उनके गाँव की सीमा, सीमा में समाहित भूमि, वन एवं नैसर्गिक सम्पदा की जानकारी प्राप्त हुई।

माह अक्टूबर, 1816 0 को इस क्षेत्र को बोर्ड ऑफ कमिश्नर के नियंत्रण में कर दिया गया था। ट्रेल ने उत्तराखण्ड को एक नई व्यवस्था दी जो वर्तमान में भी इस राज्य की विशिष्ट पहचान है। उन्होंने नानकर भूमि के अधिग्रहण से प्राप्त बचत की राशि से 1819 में पटवारी के 9 पद सृजित किए। यह एक प्रकार से राजस्व पुलिस व्यवस्था थी। पटवारी का पद पर्वतीय क्षेत्रों के प्रशासन में अत्यंत महत्वपूर्ण पाया गया। उसका कार्य अपने क्षेत्र से लगान की वसूली करना, गाँव की पैमाइश करना, लड़ाई-झगड़ों का स्थानीय निपटारा करना, सदर कचहरी को सूचना प्रदान करना एवं तहसीलदारों को सूचना पहुँचाना इत्यादि था। एक प्रकार से पटवारी ग्रामीण क्षेत्र में राजस्व एवं पुलिस दोनो के कार्य करता था।

ट्रेल ने अपने कार्यकाल में कुल 7 बंदोबस्ती चक्र पूर्ण किए उन्होनें कुमाऊँ की अत्यंत दयनीय अर्थव्यवस्था की समीक्षा की। ट्रॉन्स हिमालयी व्यापार के अन्तर्राष्ट्रीय महत्व को समझा और उसे अनुकूल बनाने के विशिष्ट उपाय किए। निजी यात्रा मार्गों को यात्री मार्ग में परिवर्तित कर बद्रीनाथ-केदारनाथ तक चरणबद्ध सड़क निर्माण आरम्भ करवाया। व्यापारिक सीमावर्ती भोटिया जाति को लगान माफी के साथ ही परम्परागत मेलों के आयोजन स्थल पर ही व्यापारिक मुकदमों की सुनवाई का प्रयास किया। इससे व्यापारियों और कृषकों का उत्साह बढ़ा जिसका प्रमाण ट्रेल के सात बंदोबस्तों की वित्तीय सफलता के आकड़ों से होता है। 

कुमाऊँ की प्रशासनिक सीमा निर्धारण में ट्रेल का मुरादाबाद के कलेक्टर हाल हेड से लम्बा विवाद चला जिसका निस्तारण 1825 में बोल्डरसन्की अध्यक्षता में हुआ। सन् 1826 0 में देहरादून चंडी क्षेत्र को कुमाऊँ में शामिल किया गया। 1 मई 1829 तक देहरादून कुमाऊँ प्रांत का हिस्सा रहा। 1820 0 में ट्रेल ने कोर्ट फीस के रूप में स्टॉम्प जारी किए।

अतः ट्रेल ने कुमाऊँ के उजड़े प्रान्त में पुनः एक व्यवस्था कायम की। विश्प हीबर नामक यात्री जो 1824 0 में उत्तर भारत भ्रमण पर आए थे, उन्होंने अपने संस्मरण में लिखा है कि कमिश्नर ट्रेल निरन्तर भ्रमण पर रहते थे एवं केवल वर्षाकाल को ही अपने मुख्यालय में व्यतीत करते थे। केनेय मेंसन ने लिखा है कि स्वयं ट्रेल को अनुमान रहा होगा कि कालान्तर में पर्वतीय जन किसी विवाद का निर्णय करेगें तो उदाहरण देगें कि कमिश्नर ट्रेल के जमाने में ऐसा होता था।

§  कुमाऊँ का पहला कमिश्नर0 गार्डनर को 1815 0 में

§  0 गार्डनर ने अपने 9 माह के कार्यकाल में सात तहसीलों और पाँच थानों की स्थापना की।

§  कुमाऊँ गढ़वाल के द्वितीय आयुक्तजार्ज विलियम ट्रेल 

§  ट्रेल ने कुमाऊँ गढ़वाल में 20 वर्ष सेवा दी जिसमें लगभग 19 वर्ष तक वे यहाँ के आयुक्त रहे।

§  ट्रेल को कुमाऊँ का प्रथम वास्तविक आयुक्त भी माना जा सकता है क्योंकि उनके कार्यकाल में ही यहाँ प्रशासन के वास्तविक स्वरूप की आधारशिला रखी गई।

§  ट्रेल ने अस्सी के बंदोबस्त के रूप में राजस्व का ग्रामवार राजकीय अभिलेखों में अंकन कराया।

§  ट्रेल ने अपने कार्यकाल में कुल 7 बंदोबस्ती चक्र पूर्ण किए।

§  कुमाऊँ की प्रशासनिक सीमा निर्धारण में ट्रेल का मुरादाबाद के कलेक्टर हाल हेड से लम्बा विवाद चला जिसका निस्तारण 1825 में बोल्डरसन्की अध्यक्षता में हुआ।

§  सन् 1826 0 में देहरादून चंडी क्षेत्र को कुमाऊँ में शामिल किया गया।

§  1 मई 1829 तक देहरादून कुमाऊँ प्रांत का हिस्सा रहा।

§  1820 0 में ट्रेल ने कोर्ट फीस के रूप में स्टॉम्प जारी किए।

उत्तराखंड में लुशिंगटन बैटन के शुधार

कर्नल जार्ज गोबान

§  कुमाऊँ के तृतीय कमिश्नर के रूप में कर्नल जार्ज गोबान की अप्रैल 1836 में नियुक्ति हुई।

§  शीतकालीन भ्रमण पर आए बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य राबर्ट मार्टिन्स बर्ड ने अपनी रिपोर्ट में गोबान की आलोचना की। साथ ही बर्ड ने कुमाऊँ को उत्तरी पश्चिमी प्रान्त की भांति मुख्य धारा में लाने के लिए रेगुलेशन 1833 के अनुरूप बंदोबस्त करने, अधीनस्थ कर्मचारी निर्धारण, असम की भाँति कुमाऊँ कोड निर्माण सम्बन्धी 16 सुझाव भी दिए।

§  सितम्बर 1838 0 तक कार्यरत कमिश्नर गोबान के कार्यकाल में दास प्रथा का अंत हुआ।

§  गोबान के काल में स्थानीय लोगों ने गोवध के विरूद्ध अपने स्वर मुखर किए।

§  1836 0 में काशीपुर को मुरादाबाद और तराई क्षेत्र को रुहेलखण्ड में शामिल किया गया।

§  गोरखाकाल में स्थापित न्याय की दिव्य व्यवस्था का अंत हुआ।

जार्ज लुशिंगटन

§  कुमाऊँ का रेगुलेशन प्रान्तों की भाँति एक नियमित प्रांत बनाने को अधिनियम- 10 (Act – 10) अप्रैल 1838 0 में प्राख्यापित हुआ।

§  इस नयी व्यवस्था के तहत प्रथम कमिश्नर जार्ज लुशिंगटन बने।

§  उन्होने अपने दस वर्ष के कार्यकाल में नैनीताल शहर की स्थापना के साथ ही राजस्व, वन, भाबर-तराई प्रबन्धन, शिक्षा, सड़क निर्माण इत्यादि पर मूलभूत कार्य किया।

§  इनके कार्यकाल में बैटेन को बंदोबस्ती अधिकारी बनाया गया जिन्हें बंगाल रेगुलेशन और 1833 के उत्तर-पश्चिमी प्रान्त रेगुलेशन के अनुरूप गढ़वाल एवं कुमाऊँ का बंदोबस्त करना था।

§  सामान्यतः 1833 के रेगुलेशन के तहत हुए बंदोबस्त कोबैक प्रोसेस बंदोबस्तकहा जाता हैं।

§  इस बंदोबस्त में राजस्व महाल की देय क्षमता का आंकलन भूमि की उर्वरता, कृषकों की क्षमता एवं वित्तीय स्थिति के अनुरूप तय कर राजस्व महाल के कृषकों में अलग-अलग निर्धारित कर दिया जाता है।

§  प्रत्येक राजस्व महाल की सीमाएं भी बंदोबस्त में लिखित रूप से निर्धारित कर दी गई।

§  यह ब्रिटिश कुमाऊँ का आठवां बंदोबस्त था।

§  इसी दौरान बर्ड और लेफ्टिनेंट गर्वनर थॉमसन के पर्यवेक्षण में राजस्व प्रशासन की आधारशिला रखी गई जो कि थोड़े बहुत परिवर्तनों के साथ वर्तमान में भी प्रभावी है।

§  इसी काल में महत्वपूर्ण निर्देशडाइरेक्शन फॉर क्लेक्टर्स ऑफ रेवन्यूऔरडाइरेक्शन फॉर सेटिलमेण्ट ऑफिसर्सभी निकले।

§  कलेक्ट्रेट कार्यालय, रिकॉर्ड ऑफिस, पटवारी रिकॉर्ड, गुजारी रजिस्टर, वैस्ट लेण्ड, परगना रजिस्टर, भूमि की बिक्री, नूजल भूमि, तकावी, खाम, तहसील एकाउंट जैसी अभिलेखीय प्रक्रियात्मक व्यवस्थाएँ स्थापित हुई।

§  बर्ड की अनुशंसा पर तराई-भावर में द्वैध शासन व्यवस्था लगी।

§  लुशिंगटन ने कुमाऊँ में असम रूल्स को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप बनाने की दिशा में अपने सुझाव दिए।

§  सदर की दीवानी एवं निजामत अदालतों ने उसके सुझावों के माध्यम से संशोधित नियमों की श्रृंखला जारी की जिन्हें बाद मेंकुमाऊँ प्रिंटेड रूल्सकहा गया।

§  वर्तमान में भिन्न-भिन्न विभागों द्वारा सरकार को वार्षिक प्रतिवेदन भेजे जाते है, ज्ञातव्य हो की यह व्यवस्था लुशिंगटन के कार्यकाल में 1839 में कुमाऊँ से ही प्रारम्भ हुई।

§  इस काल में शिक्षा के क्षेत्र में सीनियर असिस्टेंट हडलस्टन द्वारा लावारिस फंड से श्रीनगर में 1839 0 में एक स्कूल स्थापित किया गया।

§  इसी काल में बद्री-केदार यात्रा मार्ग पर अप्रैल 1840 में असिस्टेंट सर्जन की तैनाती हुई।

§  कालान्तर में अक्टूबर 1947 में नैनीताल में भी सर्जन नियुक्त हुआ एवं चिकित्सा क्षेत्र में सुधार हेतु 1848 0 को कमिश्नर की अध्यक्षता में एक डिस्पैन्सरी कमेटी गठित की गई।

§  सम्पर्क मार्ग निर्माण की दिशा में 1845 0 में खैरना-नैनीताल मार्ग का कार्य आरम्भ हुआ।

§  बागेश्वर में गोमती पर पुल निर्माण का कार्य स्वीकृत हुआ जो सितम्बर 1848 तक तैयार भी हो गया।

§  अक्टूबर 1848 0 में अपने आकस्मिक निधन से पूर्व लुशिंगटन ने कुमाऊँ के प्रशासन को एक नई दिशा प्रदान कर दी थी।

§  कवि गुमानी पंत ने लुशिंगटन की प्रशंसा में कुछ छंदों की रचना की।

बैटेन

§  लुशिंगटन की मृत्यु के उपरान्त नवम्बर 1848 को बैटेन ने पूर्णकालिक कमिश्नर के रूप में कार्यभार ग्रहण किया।

§  अब तक उन्हे इस पर्वतीय प्रदेश में 12 वर्ष का अनुभव हो चुका था।

§  उसे जॉन स्ट्रेची और हेनरी रेमजे जैसे सीनियर एसिस्टेंट कमिश्नरों के कार्यों के सुपरिणाम भी मिलने लगा।

§  इस काल में राजस्व, सामान्य प्रशासन एवं कमिश्नरी कार्यालय को स्थान्तरित कर नैनीताल में स्थापित किया गया।

§  खसरा सर्वेक्षण आधारित राजस्व बंदोबस्त लागू किया।

§  प्रशिक्षित पटवारियों की तैनाती, तहसीली स्कूलों एवं डाक बंगलो का निर्माण उनकी मुख्य उपलब्धियों में शामिल है।

§  सन् 1852-53 में चाय की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए जमीनें प्रदान की गई।

§  पुलिस दीवानी और फौजदारी प्रशासन में गुणात्मक सुधार एवं परिवर्तन इनके काल में हुए।

§  बैटेन ने नैनीताल को केवल कमिश्नरी मुख्यालय के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया अपितु इसे लोकप्रिय पर्यटक नगरी बनाने के लिए भी मौलिक प्रयत्न किए।

उत्तराखंड में हेनरी रामजे के सुधार

हेनरी रामजे

§  हेनरी रामजे ने लगभग 44 वर्षों तक विभिन्न पदों पर ब्रिटिश कुमाऊँ में कार्य किया।

§  इसमें से 28 वर्ष वे कुमाऊँ के छठे कमिश्नर रहे।

§  इसके अतिरिक्त वे वरिष्ठ सहायक कमिश्नर गढ़वाल और कुमाऊँ के पद पर भी कार्यरत रहे।

§  1857 के विद्रोह से 15 माह पूर्व उन्हें कुमाऊँ के कमिश्नर पद पर नियुक्ति मिली थी।

§  रामजे मूलतः स्कॉटलैंड के निवासी और लॉर्ड डलहौली के चचेरे भाई थे।

§  लुशिंगटन की बेटी से इनका विवाह हुआ था।

§  ईसाई मत के वे बड़े प्रचारक थे।

§  पहाड़ी भाषा भी बोल लेते थे एवं कृषकों के घर की मंडवे की रोटी भी खा लेते थे।

§  सम्पूर्ण कुमाऊँ मेंरामजी साहबके नाम से लोकप्रिय हुए।

§  अंग्रेज लेखकों ने तो उन्हेंकुमाऊँ का राजाकी संज्ञा से भी विभूषित किया है।

§  1884 0 में सेवानिवृत्त हुए और 1892 तक अल्मोड़ा में ही रहे।

§  रामजे नवाबी तरीके से शासन करते थे। वे चार माह विन्सर, चार माह अल्मोड़ा तथा चार माह भावर में रहते थे।

§  उनका सबसे प्रशंसनीय कार्य तराई-भावर को आबाद करना था।

§  उनके प्रयासों से इस क्षेत्र में मलेरिया का प्रकोप कम हुआ।

§  सड़को, नहरों एवं नगरों के विकास के साथ ही तराई-भावर में खेती का खूब विस्तार हुआ।

§  लॉर्ड मेयो जब कुमाऊँ आए तो उन्होंने रामजे के तराई-भावर प्रबन्धन की खूब प्रंशसा की।

§  1857 के सैनिक विद्रोह के अवसर पर रामजे के अधीन यह क्षेत्र अपेक्षाकृत शांत रहा।

§  बरेली एवं रूहेलखण्ड के अधिकारियों और यूरोपियों ने मई 1858 तक नैनीताल में प्रवास किया।

§  सैन्य विद्रोह की अवधि में विद्रोह के केन्द्र के इतने निकट होते हुए भी रामजे कुमाऊँ, टिहरी क्षेत्र में शान्ति बहाल रखने में सफल रहे। इसी कार्य के पुरस्कार स्वरूप वे अगले 26 वर्षों तक कुमाऊँ के निर्बाध शासक रहे।

§  रामजे ने बैकेट को बंदोबस्त का कार्य सौंपा क्योंकि बैटन का 8वाँ बंदोबस्त 20 वर्षों के लिए था और 1860 0 में इसकी अवधि समाप्त हो रही थी।

§  बैकेट द्वारा किया गया बंदोबस्त गढ़वाल-कुमाऊँ का एक ही अधिकारी द्वारा किया गया अन्तिम बंदोबस्त था।

§  इसमें गढ़वाल के 4392 कुमाऊँ के 6333 ग्रामों की पैमाइश हुई।

§  खाम स्टेट प्रबन्धन के माध्यम से रामजे को सफल वन प्रबन्धन का श्रेय जाता है।

§  रामजे ने 1861 में हिमालय के तराई क्षेत्र के जंगलों की विस्तृत रिपोर्ट तैयार करवाई।

§  रामजे साहब 1868 0 तक कुमाऊँ कमिश्नर के साथ-साथ वन संरक्षक भी रहे।

इस प्रकार हम पाते हैं कि कुमाऊँ पर 1815 0 से लेकर स्वतन्त्रता प्राप्ति तक क्रमशः गार्डनर, ट्रेल गोबान, लुशिंगटन, बैटन, रामजे, फिशर, रौस, ग्रिग, अर्सकिन, रावस, डेभिस, ग्रेसी, कम्पबैल, बिनढक, स्टाइफ, ओयन और इबॅस्टन महोदय ने कमिश्नर के पद पर कार्य किया। कुछ लोगों ने अस्थायी कमिश्नर के तौर पर भी कार्यभार ग्रहण किया था। उनकी सूची उपलब्ध नहीं हैं। जो भी हो एक बात साफ है कि लगभग सभी शासकों ने इस क्षेत्र में एकतंत्र की ही स्थापना की।

ब्रिटिशकालीन न्याय एवं पुलिस व्यवस्था

 

चंद राजाओं के समय में पुलिस प्रबन्ध थोकदारों प्रधानों के हाथों में होता था। तराई क्षेत्र में मेवाती हेड़ी मुस्लमान पुलिस का कार्य सम्पन्न करते थे। गोरखों का शासन फौजी था। अतः सैन्य अधिकारी ही यह कार्य भी देखता था। अंग्रेजी शासन काल की स्थापना के साथ ही इस क्षेत्र में पुलिस व्यवस्था का एक सुदृढ़ ढाँचा तैयार हुआ। यद्यपि तराई क्षेत्र में अंग्रेजो ने हेड़ी मेवातियों को प्रारम्भ में इस कार्य को ठेके पर दिया। इन लोगों को ठेका था कि वे इस इलाके में चोरी डकैती होने देगें और यदि हुई तो माल पूरा करेंगे। किन्तु डिप्टी सुपरिटेन्डेन्ट शेक्सपियर की रिपोर्ट के बाद सन् 1813 0 में यह व्यवस्था बंद कर दी गई और प्रत्येक घाटों पर कुमाऊँनी बटालियन के लोग रखे गए। भाबरतराई में जंगलो के मध्य लीकें काट दी गई जिनमें सवार पहरा दिया करते थे। 

सामान्यतः पहाड़ी जिले अपराधिक नहीं समझे जाते थे। इसलिए साधारण पुलिस (Regular Police) यहाँ पर पहले से भी नहीं थी। ट्रेल ने स्वयं स्वीकार किया है कि इस प्रांत में अपराधों की संख्या कम होने से फौजदारी पुलिस की कोई आवश्यकता नहीं है। कत्ल को यहाँ कोई जानता नहीं। चोरी डकैती बहुत कम होती है। अंग्रेजी राज्य स्थापित होने से लेकर अब तक जेल में 12 से ज्यादा कैदी कभी नहीं हुए और उनमें भी अधिकत्तर मेदानी क्षेत्रों से है। यहाँ पर मौतों का कारण सर्पदंश, जानवर से अथवा आत्महत्या से होती थी। स्त्री सम्बन्धी मुकदमें ज्यादा होते थे। 1824 0 में दास प्रथा के अंत और 1829 में सती प्रथा के अंत के साथ इनमें भी कमी आई।

पहाड़ों में अल्मोड़ा का थाना सबसे प्राचीन है जो 1837 0 स्थापित हुआ। इसके पश्चात क्रमशः 1843, 1869 0 ने नैनीताल और रानीखेत में थाना स्थापित हुए। अंग्रेजों ने यात्रा मार्ग पर पुलिस व्यवस्था की। मोटरमार्ग के निर्माण के बाद इन पर भी ट्रेफिक पुलिस चौकियाँ स्थापित की गई।

पहाड़ों में कम खर्च पर पुलिस व्यवस्था का सर्वोत्तम तरीका ट्रेल ने निकाला। उन्होंने पटवारी के रूप में राजस्व पुलिस की स्थापना कर ग्रामीण क्षेत्र में पुलिस के सामान्य कार्यों को इस पद में निहित कर दिया। इस संदर्भ में रामजे की राय विशेष है। कि- “मै समझता हूँ कि हमारा गाँव सम्बन्धी पुलिस का तरीका भारत में सबसे अच्छा है। यह ग्राम पुलिस सस्ती है। इसमें सरकार का कुछ भी खर्च नहीं होता।यद्यपि इस व्यवस्था में पटवारी, पेशकार, पंच, पतरौल इत्यादि सीधे-साधे अशिक्षित जनता का अधिकाधिक शोषण करते थे। 1920-22 के असहयोग आन्दोलन के बाद पटवारी की स्थिति में परिवर्तन आया। साक्षरता बढ़ने से कुमाऊँ के लोग अब पहले जैसे सीधे रहे। स्थानीय जनता में आई जागरूकता के कारण अब पटवारी को वसूली में मुश्किलों का सामना करना पड़ा। उसकी शक्तियाँ कम पड़ने लगी और पट्टी से उसका दबदबा न्यून होने लगा। 1925 0 के गजेत्यिर में इसलिए परिशिष्ट लिखा गया कि अब रामजे साहब की राय में संशोधन होना जरूरी है।

सामान्यतः ब्रिटिश राजकाल में सारे प्रान्त की पुलिस व्यवस्था इन्सपैक्टर-जनरल के हाथों में होती थी जिसके अधीन सुपरिटेन्डेन्ट, डिप्टी सुपरिटेडेन्ट, इन्सपैक्टर सब-इन्सपैक्टर होते थे। कमोबेश पुलिस का यही ढाँचा बिना परिवर्तन के अब भी जारी है। न्याय व्यवस्था के तहत वर्ष 1838 0 के नियम-10 के तहत जिले के पश्चिमकोत्तर भाग में सदर दीवानी अदालत, सदर निजामत अदालत और सदर बोर्ड माल के अधीन हुए। बोर्ड ऑफ रेवेन्यू इस क्षेत्र में मालगुजारी के विषय का अधिष्ठाता था। इस सम्बन्धी मामलों की सुनवाई केवल माल की कचहरियों में ही होती थी। सन् 1894 0 तक कुमाऊँ कमिश्नर ही न्याय का सर्वेसर्वा था। उसे फांसी देने तक का अधिकार था जिसकी अपील हाईकोर्ट में नहीं हो सकती थी। 1894 0 से 1914 0 तक सेशन जज के कोर्ट खुले। वर्ष 1914 0 में न्याय विभाग पृथक हो गया और इनका सीधा सम्बन्ध उच्च न्यायालय से हो गया। 

पहला मुंसिफ वर्ष 1929 0 में नियुक्त हुआ। कमिश्नर के रिश्तेदार को सदर अमीन बनाया गया। 1838 0 में ये पद समाप्त कर दिए गए। अधिनियम 10, 1838 के अनुसार कुमाऊँ को गढ़वाल एवं कुमाऊँ दो प्रान्तों में विभक्त किया गया। एक-एक सिनियर असिटेण्ट कमिश्नर और सदर अमीन नियुक्त हुए। मुसिंफ के अधिकार तहसीलदार पद में निहित कर दिए गए।

उत्तराखंड में आधुनिक शिक्षा का विकास

 

ट्रेल लिखते है कि कुमाऊँ में आम स्कूल नहीं हैं। और निजी स्कूलों में केवल उच्च वर्ण के लोगों को ही शिक्षा मिलती है। पढ़ाने का कार्य ब्रह्मण करते है। उच्च शिक्षा के लिए काशी भेजे जाते है। हिन्दु शिक्षा पद्धति के अनुसार ही शिक्षा दी जाती है। गोरखा काल में शिक्षा का ह्मस हुआ फिर भी अंग्रेजी आधिपत्य के समय कुमाऊँ में 129 हिन्दी संस्कृत की पाठशलाएँ थी। सर्वप्रथम अंग्रेजों ने एक स्कूल श्रीनगर गढ़वाल में 1840 0 में शुरू किया। कालान्तर में कलकत्ता शिक्षा समिति की सिफारिश पर दो और स्कूल भी खुले। 1841 0 में शिक्षा विभाग की स्थापना की गई और कई स्कूलों की स्थापना हुई।

§  सर्वप्रथम 1871 0 में O बुद्धिबल्लभ पंत शिक्षा इन्सपैक्टर बने। 

§  इस काल में 2 मिडिल स्कूल 166 स्कूल खुले जिनमें छात्र संख्या 8488 थी।

§  कुमाऊँ में आधुनिक शिक्षा की जड़ जमाने में बुद्धिबल्लभ का बड़ा योगदान है।

§  1844 में एक मिशन स्कूल खुला जो 1871 0 में रामजे कालेज बना।

§  यही स्कूल कुमाऊँ में अंग्रेजी शिक्षा का श्रीगणेश करने वाला स्कूल है।

§  रामजे कामचलाऊ शिक्षा दिए जाने के पक्षधर थे।

§  1923 0 के पश्चात् स्वराज दल के सदस्य शिक्षा बोर्ड में शामिल हुए। अब शिक्षा के प्रसार में तेजी आई। चूंकि नैनीताल का जिले के रूप में गठन 1841 0 हुआ। इसके पश्चात् ही यहाँ शिक्षा का विकास संभव हो पाया।

संक्षेप में, उत्तराखण्ड में आधुनिक प्रशासनिक, न्यायिक, राजस्व एवं शिक्षा व्यवस्था का विकास अंग्रेजी राज्य की स्थापना के साथ ही हुआ। इस प्रक्रिया से धीरे-धीरे इस क्षेत्र की जनता में जागरूकता आई और प्राशसनिक कुप्रबन्ध, जंगलात कानून, बुरी व्यवस्थाओं के विरूद्ध जनता ने आवाज उठानी शुरू की। राजनीतिक संस्थाओं का विकास हुआ। राष्ट्रीय आन्दोलन में भागीदारी प्रारम्भ हुई। काग्रेस की स्थापना इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास था। वर्तमान उत्तराखण्ड राज्य में अधिकांश व्यवस्थाओं का श्रीगणेश इसी काल में हुआ।

उत्तराखंड के कुमाऊँ कमिश्नर
(Kumaon Commissioner of Uttarakhand)

1. 0 गार्डनर (सन् 1815 – 16 ई०)

§  0 गार्डनर कुमाँऊ के प्रथम कमिश्नर थे 

§  पहला ब्रिटिश कालीन भूमि बंदोबस्त

§  अल्मोड़ा से श्रीनगर तक डाक व्यवस्था लागू की

§   

2. जी0 डब्ल्यू ट्रेल (सन् 1816 – 30 ई०)

§  कुमाऊँ का प्रथम वास्तविक कमिश्नर

§  1816 में सम्पूर्ण उत्तराखंड में डाक सेवा लागू की

§  1816 में अल्मोड़ा जेल की स्थापना की

§  1817 में दून को सहारनपुर में शामिल किया

§  1819 में पटवारी पद का सृजन किया

§  1821 में पौड़ी जेल की स्थापना की

§  1822 में कुमाँऊ में आबकारी विभाग की स्थापना

§  1823 में कुमाऊँ के 26 परगनों में विभाजित किया

§  विलियम ट्रेल के शासन काल मे अस्सीसाला भूमि बंदोबस्त किया गया

§  कुमाँऊ की सीमा का प्रथम बार निर्धारण

3. कर्नल गोबन (सन् 1830 – 39 ई०)

§  दास प्रथा, बाल विक्रय महिला विक्रय प्रथा का अंत किया अपराध घोषित किया

4. लशिगटन (सन् 1839 – 47 ई०)

§  ब्रिटिश गढ़वाल जो सन् 1815 से सन् 1839 तक कुमाऊँ कमिश्नरी की एक तहसील था, को सन् 1839 में जनपद का दर्जा मिला और अपनी जलवायु के अनुकूल अंग्रेज़ श्रीनगर से मुख्यालय पौड़ी ले गये। कुमाऊँ गढ़वाल जिलों के लिये अलग-अलग असिस्टेंट कमिश्नरों की नियुक्ति की गई। 

5. जे0 एन0 बैटन (सन् 1848 – 56 ई०)

§  1854 में नैनीताल को कुमाँऊ कमिश्नरी का मुख्यालय बनाया गया

§  बैटन के शासन के आरम्भ में दास प्रथा का अन्त कर दिया गया।

§  भूमापन का कार्य नये सिरे से आरम्भ हुआ।

§  इनके शासन काल को कुमाँऊ कमिश्नरी का स्वर्ण काल भी कहा जाता है

6. सर हैनरी रामजे (सन् 1856 – 84 ई०)

§  हैनरी रैमजे स्कॉटलैंड का निवासी था और डलहौजी के चचेरे भाई थे

§  रामज़ै के कार्यकाल में सन् 1857 . को भारत की स्वतन्त्रता का आन्दोलन हुआ था।

§  इनके शासन काल को ब्रिटिश काल का स्वर्ण काल कहा जाता है

§  कुमाँऊ का बेताज बादशाह कहा जाता है

§  कुमाँऊ में राजा रामजी के नाम से प्रसिद्ध थे

§  कुमाँऊ के सबसे लोकप्रिय कमिश्नर थे

§  1863 में बिकेट बंदोबस्त (10वां भूमि बंदोबस्त) किया गया जिसमें पहली बार वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया गया

§  सन् 1872 में पहली कार्ट सड़क रामनगर तथा रानीखेत को जोड़ती हुयी बनायी गयी।

§  सन् 1884 में काठगोदाम तक रेलमार्ग को बनाया गया।

§  रामज़ै ने पहली बार कुमाऊँ में आलू की खेती की शुरूआत करायी। 

7. फिशर (सन् 1884 – 85 ई०)

8. एच० जी० रौस (सन् 1885 – 87 ई०)

§  1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई

§  1887 में गढ़वाल राइफल की स्थापना हुई

9. जे0 आर0 ग्रिग (सन् 1888 – 89 0)

§  1889 में हतियारों को रखने के लिए लाइसेंस नीति अपनाई

10. जी0 0 अर्सकिन (सन् 1889 – 92 ई०)

§  1891 में नैनीताल जनपद के गठन हुआ

11. डी0 टी0 रौबर्ट्स (सन् 1892 – 94 ई०)

§  1894 ई० में वन नीति लागू की

§  1893 में मुक्तेश्वर में पशु अनु० संस्थान की स्थापना

12. 0 0 ग्रिज (सन् 1894 – 98 ई०)

§  1897 ई० में पहली बार पृथक उत्तराखंड प्रान्त की मांग महारानी विक्टोरिया के समकक्ष रखी गयी

13. आर0 0 हैम्बलिन (सन् 1899 – 1902 ई०)

§  1899-1900 ई० में दून में रेल का आगमन

§  1901 ई० गढ़वाल यूनियन की स्थापना

§  1902-1903 ई० नैनीताल जेल की स्थापना

14. 0 एम0 डब्लयू० शैक्सपियर (सन् 1903 – 05 ई०)

§  उत्तराखंड का प्रथम गढ़वाली समाचार पत्र का प्रकाशन 1905 ई० में हुआ

15. जे0 एस0 कैम्पवेल (सन् 1906 – 05 ई०)

§  1906ई० ग्लोगी परियोजना का कार्य पूरा हुआ यह देश की सबसे पुरानी जल विद्युत परियोजना है

§  1908 ई० कुली एजेंसी की स्थापना(जोधपुर सिंह नेगी द्वारा)

§  1909 ई० में कुमाऊँ गवर्मेंट गार्डन की स्थापना हुई

§  1912 ई० में अल्मोड़ा कांग्रेस की स्थापना

§  1913 ई० में अल्मोड़ा में होमरूल लीग की स्थापना हुई

16. पर्सी विंढम (सन् 1914 – 24 ई०)

§  1915 ई० में गांधी जी ने सर्वप्रथम हरिद्वार की यात्रा की

§  1916 ई० में गांधी जी ने देहरादून की यात्रा की

§  30 सितम्बर 1916 ई० में कुमाँऊ परिषद की स्थापना हुई

§  1921ई० में कुली बेगार प्रथा का अंत हुआ

§  1923 ई० में कुली एजेंसी की समाप्ति

17. एन0 सी0 स्टिप्फ (सन् 1925 – 31 0)

§  1929ई० में नायक बालिका रक्षा कानून बना

§  1929 ई० में गांधी जी ने कुमाँऊ की यात्रा की हल्द्वानी,अल्मोड़ा ,बागेश्वर कौसानी आदि स्थानों पर कई सभाएं की

§  23 अप्रैल 1930 को पेशावर कांड हुआ

§  30 मई 1930 ई० टिहरी रियासत में रंवाई कांड घटना घटित हुई

18. एल0 एम0 स्टब्स (सन् 1931 – 33 ई०)

19. एल0 0 गोयन (सन् 1933 – 35 ई०)

20. 0 डब्लयू इवटसन (सन् 1935 – 39 ई०)

§  1937 ई० में अल्मोड़ा के चनोदा नामक स्थान पर शांति लाल त्रिवेदी ने गांधी आश्रम की स्थापना की

21. जी0 एल0 वीवियन (सन् 1939 – 41 ई०)

22. टी0 जे0 सी0 एक्टन (सन् 1941 – 43 ई०)

§  भारत मे भारत छोड़ो आंदोलन

23. डब्लयू० डब्लयू फिनले (सन् 1943 – 47 ई०)

24. के0 एल0 मेहता (सन् 1947 – 1948 ई०)

§  कुमाँऊ का प्रथम भारतीय कमिश्नर

§  कुमाँऊ कमिश्नरी स्वंतत्र